गर्भाज] तृतीय अंक । ७३ सूरतपति-- ( उसे देखकर मनमें) इसके बदले तो सेनापतिका मर जाना अच्छा था; हे देव ! तुझको ये क्या सूझी ? चन्द्रमाका मित्र चकोर ! कांटेदार वृक्षमें गुलाब ! सूरतकी महाराज कुमारीका पति एक साधारण परदेशी ! अब मैं अपने वचनसे फिरता हूं तो मेरा विश्वास जाता है और वचनपर रहता हूं तो कन्या जाती है। क्या करूं? सांप छछुन्दरकीसी मेरी दशा हो रही है : ( उदास भावसे सिर झुका लिया । ) रणधीर--(सूरतके महाराजको उदास देखकर, मनमें) तुम्हारे उदास होनेसे मेरा क्या नुकसान ? मैंने किसी तहरके लालचसे ये काम नहीं किया मैं तो केवल जस चाहता हूं :- मेघन कवई न जल चहौं, चातक सम तो पास । मैं मयूर मीठे वचन सुन, मन करत हुलास ॥ जो तुम बुरा मानो तो अपना नगर रक्खो मेरी विद्या नहीं छीन सकते ।-- विना को हंस पर, हरें कमल वन वास । पैजल दुग्ध विभेदगुण, किंहि विधि करै विनास ?. ( आगेको चल दिया ) × X X X X × मोहिनी - ( मालती से ) आज समुद्रने अपनी मर्जादा छोड़ दी, सूर्य चन्द्रामकी चाल चल गई, अग्निमें दाहक शक्ति नहीं रही, पवलकी बाहक शक्ति जाती रही मालती – कैसे ? प्रेममोहिनी--मेरा मन इस पुरुषकी तरफ गया । मालती तो क्या तुम किसीसे विवाह नहीं किया चाहती ? -- प्रेम मोहिनी -- रणधीर सिवाय मैं किसीको पुरुष नहीं समझती । 1
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