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पृष्ठ:रणधीर और प्रेममोहिनी.pdf/१४२

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७४ रणधीर और प्रेमंमोहिनी । 1 मालती - और जो ये रणधीर ही हो । H प्रथम प्रेममोहिनी-सच कह, क्या ये रणधीर है ? मालती --ता, मैंने एक बात कही कि जो ये वोही हो ! प्रेनमोहिनी तब तो कुछ कहने मुनने की बात ही नहीं रही । ( दोहा ) मालती - सज्जन प्रीति वियोग ते, कबहु न होत विनाश । चन्द ढक्यो घनसे तदधि, करंत कुमोद प्रकाश || प्रेममोहिनी -- ( आंसू भरकर, गद्गद स्वरसे) सही ! (नेत्र वन्दकुर बेसुधसी हो गई ) मेरे ऐसे भाग-- मालती -- ( महलके नीचेसे रणधीरको जाते देख ) राजकुमारी ! इष्ट देवका ध्यान पीछे करना, पहले दूजके चन्द्रमाका दर्शन तो कर लो । ( प्रेममोहिनीने नेत्र खोलकर रणवीरको जाते देखा । अचेत अवस्थामै उसकी अंगूठी उसके हाथसे रणवीरपर गिर पड़ी। रणधीरने अंगूठी को हाथमें झेलकर प्रेम- मोहिनीकी तरफ देखा । वो अंगूठी अपनी अंगुली में पहनकर वहांसे चल दिया 1 ) प्रेममोहिनी --~ ( रणधीरकी तरफ देखकर ) रणधीर । तुम सचे रणधीर हो ! व्याज तुमने अपना नाम सचा कर दिखाया। तुम्हारा मुखचन्द्र देखकर मेरा मन समुद्रकी तरह उमगता है । ( झरोखे से नीचेकी तरफ देखकर ) हाय ! वे तो चले गए। बिजलीकी चमकसे भी थोड़ी देर उनका मनोहर रूप दिखाई दिया । अव क्या होगा । मालती-- धीरज धरो, वे समय घबरानेका नहीं है 1 + + + + +