अथ द्वितीय गर्भा । स्थान रणधीर सिंहका महल । रणधीर मलमली कॉचपर सिरहाने हाथ लगाकर लेट रहा है और जीवन उसके चरण दाबता से ' [ द्वितीय जीवन -- ( चरण दाबते दावते ) इस समय आपका मन बहुत उदास दिखाई देता है । रणधीर -- तैने कैसे जाना जीवन --- आपके मुख देखनेसे प्रकट जाना जाता है । रणधीर - - ( आवस मनमें) मेरे मनका भाव दूसरेने पहचान लिया । ( प्रकट) अच्छा, तू क्या अबतक इसका कारण नहीं जानता ? देख आज हमारे दुःखकी आग में घी डाला गया । तू अच्छी तरह जानता है कि हम केवल मानके भूखे हैं, हमारी जानमें अपमान और मौत समान है । जीवन -- आपको दुःख देखकर घबराना उचित नहीं । आप महत् पुरुष हो :- बड़े वियत में पड़े तजत न पर उपकार । राहु ग्रसित शशि जगतको पुण्य बढ़ावनहार ॥१॥ मलय करत निज गन्धसों वृक्षन आय समान । कहहु करत कछु मलयको वृक्ष बहुरि सन्मान ॥२॥ रणधीर -- इस विचार में तू भूलता है, क्योंकि थोये बालोंका चन्दनसे कुछ भी उपकार नहीं होता । उपकार तो उपकार योग्यों के साथ होता है पर ( आंखोंमें
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