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पृष्ठ:रणधीर और प्रेममोहिनी.pdf/१४८

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८० रणधीर और प्रेममोहिनी । [द्वितीय रणधीर -- जगतकी कोई बात, गुण, द्रोपस खाली नहीं पाई जाती, परन्तु जिस बातमें गुण विशेष हो सो अच्छी और दोप विशेष हो सो बुरी समझी जाती है,इस कारण आजकी बात मैं तेरे वचनानुसार कुछ गुण हो तो उसको अच्छी नहीं मान सकता, क्योंकि उसमें दोप. विशेष हैं । .: जीवन-क्यों ? आप क्या इसको छोटी बात समझते हैं ? मेरे जाननेमें तो आपको इस समय भी सूरत के महाराजकी सभा में अवश्य पधारना चाहिये । रणधीर - जीवन, तैने क्या कहा ? 'तू नहीं जानता कि मेरे मन में कोवकी आग जल रही है, फिर तू उसमें घी डालकर उसके भड़कानेका क्यों उपाय करता ? न जाने ये आग किस किराको भस्म कर डालेगी । जीवन -- मैं इस वातसे निश्चिन्त हूं, क्योंकि आगको आग नहीं जला सकती । आप आनन्दसं राजसभामें जाये । ! हाथीके चपेट मारे बिना सिंहका बल नहीं जाना जाता और भाग्यपर बैठ रहना तो कार्यरोंका काम है । रणधीर ---भला जीवन ! बिना बुलाये जाना तो किसी तरह मुनासिव नहीं । जीवन -- सब राजोंके बुलावे में आपका बुलावा आ गया फिर आपको यहीं विचार है तो बताइये बादलोंको कौन बुलाने जाता है जो पानी बरसाकर स्वकी ताप मिटाते हैं ? रणधीर - - ( मन ) इधर विश्वासी जीवने भी हठ करता है, उधर मेरे मनमें भी वीर रस भर रहा है इस कारण अब तो राजसभा में जायेंगे, होनी होय सो' हो । ( प्रकट) अच्छा, जीवन तेरा कहना माना, सेव तू हमारे. पांचों शस्त्र और वस्त्र लेआ जीवन - ( जाते जाते ) लाया, ( जाकर सब सामान लाता है और रणधीर चत्र पहन, शस्त्र सज, दर्पण देख, जानेको तैयार होता है तव जीवन जल्दी से जलका भरा कलश के सामने आ खड़ा होता है ।