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पृष्ठ:रणधीर और प्रेममोहिनी.pdf/१५८

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अथ चतुर्थे गर्भा । स्थान, सूरतके महाराजका नजर बाग | ( प्रेममोहिनी और मालतीका प्रवेश ) [ चतुर्थ मालतीन जाने तुम्हारा हार कहां गिर पड़ा होगा । तुम इस अन्धेरी रातने वृथा भटकती हो । मनमोहिनी — मेरे जान तो वो यहां अवश्य मिल जायगा। तू जरा अच्छी तरह देखभाल क मालती - राजकुमारी, बुरा न मानों तो एक बात कहूं । 'प्रेममोहिनी सखी! मैं तेरी कौनसी बातका बुरा मानती हूँ । wwwww मालती- मेरे जान तो, तुम हार ढूंढनेका मिस करके रणधीरसिंहको ढूंढने यहां आई हो । प्रेममोहिनी--तेने ये बात कैसे जानी ? मालती इस समय तुम पत्तोंकी आहट सुनकर चारों तरफ देखने लगती हो । प्रेममोहिनी - ( मनमें ) आग वत्रसे नहीं की जाती । ( प्रकट ) तेरी बात झूठ है, पर उसको सच मान लें तो तेरे विचार में कैसी रहे ? मालती- मेरे विचारने ये बात अच्छी है पर ये रीति अच्छी नहीं । प्रेममोहिनी क्यों ? मालती —तुमसी राजकन्याका आधीरात के समय एकान्तमे परपुरुषसे मिलना तुम्हारे कुल और गुणोंको कलह लगाता है। प्रेममोहिनी ---" पर की जगह "निज" समझकर विचारकर ।