रणधीर और प्रेम्मोहिनी । [ द्वितीय रिपुदमन --- (आश्चर्य से मनमें ) मैन केसी, अचरजकी बात देखी ! क्या अबतक मेरा मन ठिकाने था, इस वीरने किस कारण अपने प्राण शोक कर मेरी रक्षा की ? और रक्षा भी की तो मुझसे बिना मिले क्यों चला ? इस कलिकालमें किसीसे कोई अच्छा काम बन जाता है, तो वह जन्म भर अपनी वड़ाई मारता है । करके कुछ न जतावे, उसको साधारण आदमी प्रीति करनेकी बड़ी चाहता है, पर ऐसे सज्जन फिर जो मनुष्य इतना बड़ा काम कैसे समझू ! मेरे मन में इस वीरसे खुशनदकी बातों से कभी प्रसन्न नहीं होते 1 इस कारण पहले इनसे छेड़छाड़की वाने कर्म ( प्रकटमें रणवीरस) आपके कानसे आप क्षत्री जाने जाते हो, पर आपने मेरे निशानंपर शत्र चलाया तो अच्छा नहीं किया । रणधीर - ( फिरकर, मुसकुराते हुए ) मेरा ध्यान इस बात पर न था ।. रिपुदमन तो इसके बदले में आपको अपना निशाना बनाऊं ? रणधीर निसंदेह | रिपुदमन — अच्छा, तो मैं आपके मनको अपना निशाना बना कर प्रेम वाण छोड़ता हूं । रणधीर -- पर ये शिकार तो शिकारीके शिकार हुए बिना हात नहीं आती । ( अर्थात दूसरेके मनमें अनी प्रीति उत्पन्न करनेके पहले अपने मनमें उसकी प्रीति करनी चाहिये । रिपुदमन --सी मैं तो पहले ही अपने शिकारके साथ आपका शिकार हो चुका, पर आपके मनको अपना शिकार बनानेके लिये मेरी सामर्थ्य नहीं है । रणधीर समर्थवानों के कहनेकी यही रीति होती है :- दोहा | गरजै सो वरसै नहीं, शरदजलद अनुमान । वरसै सो गरजै वहीं, वर्षा मेघ समान || ॥
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