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पृष्ठ:रणधीर और प्रेममोहिनी.pdf/२५

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+ 4 फक ] प्रथम अंक १७ नाथूराम - उणने पहली तो पोथी पानंडासे ही मौसर नहीं, फिर मीनत मजूरीरा • कान घवराचे, जिद राजगार धन्दों कांकर होय ? मैं तो उणरो यो बिर्तात देख, | अपना टावर गुरुजी री पोशाल मांही नहीं जाणें दीनो है । ( १ )

सुखवासीलाल- ( मनमें ) यह हमारे समझानेसे समझने लायक नहीं हैं, (प्रकट)

अच्छा, हमारी सरकारका हिसाब लाये हो ? नाथूराम - हां अनूदाता लायी हूं । (2) सुखवासीलाल- कुल कितने रुपये जुड़े ? नाथूराम - हणे धडो नहीं लगायो, ( मनमें ) पहली ही घडो बता देस्यूं तो वारी गुंजा कठे रहसी । ( ३-) सुख बासीलाल- अच्छा, चिड़ियां लाभ; अव्वल मुकाबला कर लें । नाथूरान -- हाजर छे ( चिनियां सुखबासीलालको देता है ) सुखवासीलाल-रोगन दर्ज कितना है ? (४) । नाथूराम-छम्मण, पानसेर, पांच्छटांक । ( ५ ) .. सुखवासीलाल -- कैसे निखे लगाया ? " (१) उसको प्रथम तो पुस्तक पतके वाचनेसे ही अवकाश नहीं, फिर मिहनत मजदूरीक arat aai aa रोजगारधन्धा क्योंकर हो । मैने तो उसका यह हाल देख, अपने लकको गुरुकी पाठशालामें ही नहीं जाने दिया है । (२) हां अन्नदाता लाया हूँ । (३) अबतक जोड़ नहीं लगाया ( मनमें ) पहले ही जोद- बता दूंगा तो फिर दरानेकी गुंजायश कां रहेंगी । (४) कितना है । (५) छः मन, पांच सेर, पांच छटांक ? 1