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पृष्ठ:रणधीर और प्रेममोहिनी.pdf/२९

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गर्भाह 1 अथ चतुर्थ गर्भा । स्थान, रणधीर सिंहका महल । ( बीचमें गोल मेजपर एक दर्पण रखा है, लम्प जल रहा है, चारों तरफ मखमली कुर्सियां रखी हैं, दर्पणके सन्मुख चौबेजी एक कुर्सी पर रज लगाये बैठे हैं । चौबेजी -- ( दर्पण में दूसरा चौबे समझकर ) नोबेजू तुम राजी हो, मधपुरीते आये किले दिन भये ? हमारे घरहू गये, हमारे छोरानें तुमको अपनों वावा तो नांय "समझ लिओ, (डरकर मनमें) इनको यहां रहवो अच्छी नांहि । ( प्रकट ) भैय्या यहां का तन्त है तुम कहो तो हमहूं तुमारे स परदेस चलें, तुमने भांगहू पीईके नांहिं ? नांहि पीई होइ तो हमारे पास लुगदी तय्यार है; छान टारें । (१) ( रणधीर और रिपुदमनका प्रवेश ) रणधीर ~~ ( आते ही शीसेको पलटकर ) चौबेजी किससे बात कर रहे थे ? चौबेजी~-~-( चोंककर ) आपने भलो सन्देह मिटाइ दिओ मैं तो जार्को दूसरो चोब समझे हो ! ( २ ) १) चौबेजी तुम राजी हो, मथुरासे आये कितने दिन हुए ? हमारे घर भी गये थे। हमारे लड़केने तुमको अपना वाया तो नहीं समझ लिया । ( डरकर मनमे ) इनका यहां रहना अच्छा नहीं । ' (प्रकट ) भाई यहां क्या सार है, तुम कहो तो हम भी तुम्हारे साथ परदेश चलें, तुमने भङ्ग भी पिया ! नहीं, नहीं पिये हो तो हमारे पास लुगदी ( अर्थात् घुटी घुटाई भङ्ग ) सय्यार है छान डालें । ( २ ) आपने अच्छा सन्देह मिटा दिया मैं तो इसको दूसरा चौबे समझा था ।