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पृष्ठ:रणधीर और प्रेममोहिनी.pdf/४१

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पर्मान प्रथम अंक ! '३३ करके अपनी वैरख्वाही जाताना ! अरे मियां दौलत बड़ी चीज है इससे दुनियांके सारे काम निकलते हैं देखो जवानीका कमाया जई की में काम आयगा ? - ( १ ) 1 जीवन - क्या मैं रणधीरसिंहसे बेइमान हो जाऊं, एकको मालिक बनाकर दूसरेकी आस करूं, झूटी महनत दिखाकर मालिकको धोखा दूं, मुझसे तो यह नहीं हो सकता । मैं तो सत्री महनत भी नहीं जताया चाहता, जताऊं क्या ? जिसके अन्नसे इस देहका पालन होता है उसके काममें इस देहको लगाना चाहिये, फिर दूसरेकी कारगुजारीको धूल मिलानेसे उनका जी कितना कल्पेगा, उसके कोसनेसे मेरा सत्यानाश हो जायगा आगेको मालिकको नौकरीमें मन न लगेगा और ये पाप मेरे सिर चढ़ेगा, ना भाई ना । ऐसा काम मुझसे तो नहीं हो सकता, धनकी क्या ? जिसके हाथ गया, उसका हो गया, धनके लिये मैं अपना धर्म कैसे छोड़ दूं । दांत न थे जब दूध दियो अथ दांत दिये कहा अन्न न दे हैं, जो जल मैं थल मैं पंछी पशुकी सुध लेत सु तेरी हु ले हैं । काहेको सोच कर मन मूरख सोच करे कछु हाथ न ऐ हैं, जान के देत अनकं देत जहानकों देत सो तोकुं हुं हैं ॥ १ ॥ मुखवासीलाल -- (मनमें ) ये तो उन्टी चाल पड़ी। (प्रकट ) मैंने तुम्हारा दिल देखने के वास्ते ये बात कही थी, तुम्हारी राय दुरुस्त है । (१) देखो कुछ दूरकी कर्तोल विचार करो नौकरीकी जड धरती से या हाथ उन्हीं है। इसके ऊपर भूले रहना बुद्धिमानका काम नहीं। तुम नाहक महनत करके जान देते हो। मालिके आगे उपाय और महनत करके कारगुजारी दिखाना, पीछेसे यार दोस्तोंमें बैठकर आनन्द करना, वातों बातोंमें दूसरेकी कारगुजारी धूल करके अपनी वाही ( शुभचिन्तक पता ) दिखाना । साहब ! रुपया बड़ी चीज है इससे संसारके सब काम निकलते हैं देखो जवानीकी कमाई बुढापेमें काम आती है।