ફ્ર रणधीर और प्रेममोहिनी । [ द्वितीय A जीवन-भला इससे आपके वन्धू जनोंका क्या होगा ? रणधीर -- कुछ हो, सत्र लोग मतलवको प्रीति करते हैं। जितना मतलब निकलता है उसकी उससे उतनी प्रीति होती है जिसका जिसमें और वो मतलब बहुधा द्रव्य सम्बन्धी पाया जाता है। जैसे मीठेके लिए चैटिये दौड़ती हैं त रुपये के लिए मनुष्य फिरते हैं । रुपया संसारी मनुष्योंके नाच नन्वानेकी एक कल फिर ऐसी मतलब की प्रीतिके वास्ते मैं मित्रकी प्रीति कैसे भूल जाऊं । मेरे शत्र जल्दी ला । मित्रके दुःख दूर किए बिना मुझको एक एक पल वरस बरसलकी बरावर बीतता है। जीवन -- आप सरीखे कुलवानों को तो ऐसा ही करना चाहिये, परन्तु में मारा गया । हाय ! मेरा क्या हाल होगा ? रणधीर - जीवन ! ओ जीवन ! तू क्या कहता है, आज तुझको क्या हो गया ? मैं मरते मर जाऊंगा पर तेरा उपकार कभी नहीं भूलूंगा । सेवत सकल जन नाथको धन हेतु प्रीति बढ़ायकै । . मालक निघन तो धन भए धन मिलन हित चित चायकै ॥ विकल सम्पत छीनं आस विहीन निज पति पायकै ।
- पूजत न तो सम धन्य कौ जन अवनि तलमैं आयके ॥१॥
तेर उपकारका बदला तो मैं इस समय कुछ नहीं दे सकता । प्रसन्नता के लिए तू मेरा मालमता ले । परन्तु मेरी जीवन --- ( आंसू भरकर ) मेरे स्वामी ! मेरे छन ! मेरे मुकुटमणि । आप ऐसा वचन मत कहो। आपके मुखसे ये वचन अच्छा नहीं लगता। मैं क्या धन दौलतका भूखा हूं ? मैं तो केवल आपके मनका भूखा हूं। मेरी तो जन्म भरकी कमाई आप हो, आप ही मेरे नयनोंका प्रकाश हो, आप ही मेरे पूज्य हो, आप हो