१२: रणधीर और प्रेममोहिनी । [ चतु रणधीरसिंह यांते थे अब उन शस्त्रोंका बांधनेवाला कोई दिखाई देता है ? : इसी तरह जिन लोगोंन रणधीरसिंहको सेवा की, उनसे कभी दूसरेको नौकरी हो सकती है ! हमलोग वनमें रहकर अपनी उर पूरी कर देंगे पर रणधीर सिंह के सेवक होकर दूसरेकी झूटन कभी न खायेंगे । मुखवासीलाल -- (मनमें) अगर इतने अपने कौलको ताईद को तो बेशक ये कुल माल मेर कजे तसर्रफमें आयगा । अच्छा, अब मैं इसको fragrant तवीर करू. क्योंकि गुल जाए होनेसे समर और समर जाए होनेसे तुम हासिल होता है। ( प्रकट ) बस, आप ज्यादे चर्व जवानी न करें, मैं आपके कौल फैलसे बखूबी वाकिफ हूं। आप अपनी वफादारी वो जांनिसारी जाहिर करनेके वास्ते ये वाल डालते हैं, मगर महज फजूल । वगैर आग राखसे मोम कभी नहीं पिंग- उता । ( १ ) | जीवन-भाई ! मैं कारगुजारी नहीं दिखाता। उनकी कृपाके आगे मेरी सेवा किस गिनती में है । मैं सौ जन्मतक मुफ्त में उनकी सेवा करूँ तो भी बराबर नहीं हो सकता। तुम्हारी बातोंका मतलब मैं अच्छी तरह समझता हूं। देखो, रण- धीरसिंह अपने सब नौकरोंपर एक्सी दया रखते थे पर तुम उनकी दयाको अपनी कारगुजारीका फल समझते हो। इस कारण तुम्हारे मनमें उपकारका उभास नहीं (१) (मनने) जो इसने अपने वचनको निभाया तो ये सब माल मेर अधिकार और वर्ना आवेगा। अच्छा, अब में इसको जिदपर चढ़ाने का उपाय करूं, क्योंकि फूल्के नम्र होनेत फल और फूलके विनाशते वीज प्राप्त होता है । ( प्रकट) दस, आप ज्यादा अच्छी तरह वाकिफ हूं। आप (उनके) ढालते हैं, परन्तु वृथा बान बनावें, मैं आपको जवान और कर्तवारीने raat ata और निवारी जंतानेके लिए ये चाल राखसे मोम कभी नहीं पिंगलता । ·
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