mata ] चतुर्थी अंक. 1 १२७ होता और मैं अपनी जीविकाको केवल उनकी कृपाका फल समझता हूं इस कारण लाजसे मेरी आंख नीची हुई जाती है। बस, इतना ही तुम्हारे मेरे सुभावमें अन्तर है । • मुखवासीलाल- - अच्छा, मैं बेवफा, अहसान फरामोश सही तुम तो बड़े वफादार हो । देखें इस वफादारी और खरवाहीके जज्बेमें आकर आज 'क्या बहादुरी करोगे ? (१) जीवन --अव - अब मैं क्या बहादुरी करूंगा ! डोर कटते ही पतङ्ग तो कंट चुका, उसके ढांचको कहीं लिए फिरो, जवतक घटतीके दिन पूरे न होंगे इसका यही हाल रहेगा । सुखवासीलाल – तुम तो अभी दुनियांको तर्क करते थे ? " तर्के दुनियां शहवतस्तो हविस् । पारसाई न तर्फे जामेओवस" (२). . जीवन मैं अभी संसारको छोड़ता हूं। रणधीरसिंह बिना मुझको ये मकान डरावना लगता है । परन्तु तुम कभी खोटा लालच न करना । अच्छे लोग महनत और धर्मकी कमाईपर दृष्टि रखते हैं, और जिनको मुफ्तके माल खानेकी धान पड़ जाती है वे किसी कामके नहीं रहते, उनको सब निर्लज्ज बताते हैं,, उनसे देशका बड़ा अहित होता है। मैंने महाभारतमें महात्मा विदुरका ये वचन सुना था कि "पापी (मनुष्य) पहले फलते फूलते हैं परन्तु पीछे जड़मूल से नाश • ( १ ) अच्छा, मैं निर्मोही और कृतन सही । तुम तो बड़े प्रीतिमान हो; देखें इस प्रीति- और शुभचिन्तकतके आधीन होकर आज क्या बहादुरी करोगे ? (२) तुम तो अभी संसारको छोड़ते थे ! संसारका छोड़ना काम और लालच छोडनेसे है।. राम्य वलके छोडनेसे नहीं । और बस 1 "
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