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पृष्ठ:रणधीर और प्रेममोहिनी.pdf/६९

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१३६ रणधीर और प्रेममोहिनी । ( मालतीने गुलाब छिड़का, चम्पा बस्त्रसे पचन करने लगी ) [ प्रथम सूरतप्रति - ( सचेत होकर) बेटी यह क्या होता है ? इस स्वयंवरका ये भन्त हुआ ! हाय ! मेरी जन्मभर की कमाई पलभरमें गई ! ये विवाहका सामान इनके किTrain काम आवेगा ! मोहिनी ! तू अपने दुखिया वापसे एक बात कहे बिन उसको दुखसागरमें छोड़कर कहां चली गई ? हाय ! हमने ऐसा क्या पाप किया होगा, जिसका यह फल है । हे पापी प्राण ! तू इस अधम शरीरको अबतक क्यों नहीं छोड़ता ! अरे जब ऐसा विकराल दुख सह लिया तो कौनसा दुख भोगकर छोड़ेगा ! (क्लिख बिलखकर रोने लगा ) 1 - मालती - (चम्पासे रोकर ) सखी | हमारे भागमें क्या दुष्ट देवने यही लिख दिया था कि रणवीर और प्रेममोहिनीके लिए फूलों की सेजके बदले चन्दनकी चिता बनाये ! (चिता बनाने लगी) | ( सूरत के मन्त्रीका प्रवेश ) मन्त्री -- ( बहुत रोकर ) हाय ! हमारा नसीर फूट गया, हमारा सर्व लुट गया हमारी सब आम टूट गई, हमारे नेत्रोंका प्रकाश जाना रहा ! हे कठोर दैव ! तुझको हमपर कुछ दया न आई ! हाथ ! हम भंवोंके टटोलकर चलनेकी लकड़ी छोनकर तू क्या सुखी होगा ? हे धर्मराज, हमारी विनय सुनकर हमको जल्दी इस दुख सागरसे निकालो। सूरतके महाराज-मन्त्री ! ऐसे ऐसे वचन कहकर क्यों मेरे व्याकुल मनको अत्रेत करते हो ! धीरज धरो, संसारके सब दुखोंको पहले पापका फल समझना चाहिये । मन्त्री – महाराज ! राजकुमार रिपुदमनसिंहके कुसमय संसार छोड़नेका दुखदाई वचन आपसे कौन कह सके ।