१३८ रणधीर और प्रेममोहिनी । [ प्रथम लगाऊंगा, कौनसे जन्ममें तुम्हारा मुख चन्द्र देखूंगा, तुम्हारा मुख स्मरण करनेसे कलेजा फटता है! हाय ! तुम कहां चले गए ! तुमने मुझको छोड़ दिया, तुमको मेरे बुढ़ापेपर कुछ दया न आई, मेरी एक बातका जवाब तो दो, मेरी तरफ आंख उठाकर तो देखो। तुमको एक समय फूलोंकी सेजार नींद नहीं आती थी अब तुम कठोर भूमि सदा के लिए ऐसी गहरी नींद सोते हो । हाय ! तुम्हारा यह हाल देखकर धरती माताकी छाती भी न फटी । पर्वत, आकाश और नदी नाले भी वैसे ही बने रहे ; तुम्हारा यह हाल हो, और मैं जीता रहू ! मेरी छाती बोझसे दवी जाती है, मेरे हाथ पांव गिरे पड़ते हैं, मुझको आंखोंसे कुछ नहीं दिखाई देता, कानोंसे सुनाई नहीं देता, मेरे प्राण जाते हैं। मुझको प्यारी सन्तानके पाल ले चल ! अरे मुझको प्यारी सन्तानके पास ले चल ! प्राण चले मुझको ( मूर्छित होकर गिरता था सो मन्त्रीने रोक लिया) । मन्त्री --- महाराज ! महलमें महारानीजी अचेत पड़ी हैं, यहां आप ऐसे अधोर हो रहे हैं, इस दशामें हमलोगों को कैसे धीर्य रहे । ( वीरबेशसे कवच और शस्त्र सजाकर एक योधा आता है) योधा - आज इस नगर में किस कारण हा हा कार हो रहा है ? बहुतसे मनुष्य मूर्छित, मृतक, अङ्गभङ्ग, दर्द से व्याकुल, रुधिरमें डूबे हुए, धरतीपर लोटते हैं, तरह तरहके कपड़े और गहने बिखरे पड़े हैं, कितनेक मुर्दों की छातीसे वाण निकलते हैं, कितनेक घायल अपने घावपर विना पट्टी बांधे खाली घोड़ेको देख विसुरत हैं, बहुतसे वीर धरती की तरफ देखकर विलख रहे हैं, कितनेक क्षत्री रणभूमिमें पड़े हुए कातर स्वरसे जल जल पुकारते हैं, कहीं किसी वीरको स्त्री अपने मरे हुए पतिका सिर गोदमें ले सती होती है, कहीं किसी वीरकी माता अपने वेटेके लिए रो रोकर प्राण खोती है । इस लड़ाईका क्या कारण होगा ? कुछ हो । मुझको एकबार सूरतपतिसे •
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