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पृष्ठ:रणधीर और प्रेममोहिनी.pdf/७९

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१४६ रणधीर और प्रेममोहिनी । . [ प्रथम कठोर बात मुखसे नहीं निकालते थे, ये सच लक्षण तुम्हारे शीघ्र मरनेके थे, क्योंकि जो मनुष्य थोड़े दिन जीते हैं उनमें भलाई और बड़ाईके गुण बहुत पाए जाते हैं । हाय ! मेरे जोतपर धिक्कार है । मुझको तुम्हारे आगे अपने पछतावेसे मन खोलकर रोनेका समय भी न मिला ! देखो ! सब संसारमे माता पितासे सन्तानका पालन होता है परन्तु मैं उल्टा दुखदाई हुआ । संसारमें प्राप्त सुखको सुख कोई नहीं समझता परन्तु वो (सुख) नाश हो जाता है तब उसका वैभव मालूम होता है । हाय ! तुम सरीके रनको मैंने कांच समझकर फेंक दिया, अब मणि विना सांपका जीना वृथा है !!! सूरतपति- आप क्यों इतना विलाप करके अपने प्राणको खोते हो । पाटनपति - देखो, मेरा प्राणप्यारा पुत्र मुझको सदाके लिए छोड़कर चला गया । उसके देखे बिना मुझे स्वांस लेने में दुःख होता है, धीरज कहांसे आवे ? मुझसे बढ़कर आजतक संसारमै कोई दुखिया न जन्मा होगा ! हाय । मैं रणधीर सिंहका ये. हाल देखनेके लिए यहां आया था ! जब मैं यहांसे खाली रथ में बैठकर जाऊंगा तो मुझको देखकर नगर वासियोंकी क्या दशा होगी। रणधीरसिंहको कुशल पूछेंगे तब मैं क्या जवाब दूंगा । परिवारवाले गद्गद स्वरसे रणधीर सिंहकी माता गऊकी तरह दौड़कर अपने चछड़े से मिलने आवेगी तो मेरा चित्त कैसे स्थिर रहेगा ! वो अपने लालका हाल सुनतेही हाय मारकर भर जायगी तव में कैसे जीता रहूंगा 1 ( मूर्छित हो गए ) पाटनका मन्त्री --- (आंसू भरकर ) क्या महाराजने सद् प्रजाके अनाथ करनेका विचार किया है !, पाटनपति - ( कुछ सुधर्मे आकर ) मैं क्या अनाथ करूंगा देवने ही अनाथ कर दिया । जैसे अमृत चिन चन्द्रमा और महीन पक्षीकी दशा होती है तैसे रणधीर बिना