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पृष्ठ:रणधीर और प्रेममोहिनी.pdf/८४

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गर्भा ] पंचम अंक 1 १५१ इससे हमारा वंश चलेगा और ये ही बड़ा होकर हमारा निपुत्री कुलमे पानी (पिंड ) देनेवाला होगा। देखो, यह कहीं हमारी याद करके सर न जाय । इसको अपना समझकर अच्छी तरह रक्षा करना । इसको सुमार्गेमें डालना ( आंसू भरकर ) और ये बड़ा हो ! हमारी प्यारी प्रजाको प्राणसे अधिक रखना | भैया ! तुम ज्ञानवान हो । हमारे अन्त समयके वचनको भूल मत जाना, तुम्हारे कामसे हमको परलोकमे सुख मिले उपाय करना ( मन्त्रीको छातीसे लगाकर ) हमारा सर्वस्व तुम्हारे आधीन है । अब हमसे कुछ नहीं बोला जाता । अब हम तुमको अन्तकी असीस देकर बिदा होते हैं । हाय ! प्यारे रणधीर बिना जगत अंधेरा लगता है ! ! ! ( मूर्छित होकर गिर पड़े ) पाटनका मन्त्री --- ( आंसूं भर कर वरण दावते दाबते ) महाराज | आपने ये क्या विचारा ? आप कभी ऐसा वचन न कहें । क्या सब संसारको दबोनेकी आपके मनमें है ! रणधीरसिंहक वियोग रूपी अथाह समुद्र में पाटनको जहाज बनाकर सब नगर निवासी चढ़ चुके अब आप खेवट होकर खेवेंगे तो बेड़ा पार लग जायेगा, नहीं तो सब संसारके वनेका समय है । आपके नामसे जो काम होता है हमारे उपायसे नहीं हो सकता । हा ! आपके विना हम क्या करेंगे ? हे जगदीश ! हमारा दुख हर! सब संसारका दुःख दूर कर ! ! 1 ( धीरे धीरे परदा गिरता है ) इति प्रथम गर्भाङ्कः । पश्चम अङ्क समाप्त । ॥ समाप्त ॥