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पृष्ठ:रणधीर और प्रेममोहिनी.pdf/९१

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म 1 तृतीय अंक । यर जल भीतर यसै जन्मभर तप कर तनहि झुरावै । पै. सुपनेहु अपने पीतमको, विध न बियोग करावै ॥ चरु तन राख लगाय चाह भर, खाय धरनके हूका पै करतार पियार यारसों, कबहुं परै नहि चूका ॥ . जातिपाति वर गोय खोय कुल, सब तज होय भिखारी । कबहु न होय मीतकी मूरति इन नैननते न्यारी ॥” ९७ ( गद्गद स्वरसे) हे अधम शरीर ! तैने प्यारे भित्रका सङ्ग न दिया तो क्या हुआ ? प्राण तो तेरा साथ छोड़कर उसके सङ्ग जाता है । हा मित्र ! आपके वियोग में बहुत दिन जीने के बदले तत्काल प्राण छोड़ देना मेरे मनको अच्छा लगता है । हे प्यारे आप मुझको छोड़कर चले गए, पर मैं आपसे अलग होनेको सामर्थ्य नहीं रखती । ( मूर्छित होकर गिरती थी, इतनेमें रणधीरने जल्दी से आकर घुटनेके सहार हाथोंपर रोक लिया । ) RA रणधीर उप्तते बड़ी भूल हुई जो इस अति कोमल प्रियाकी प्रेम परीक्षाके लिए ऐसा कठोर विचार किया। ये लक्ष्मी मेरे नयनोंमें अमृतरूपी अञ्जनकी सलाईके समान लगती है और इसका शरीर मेरी देहको चन्दनके समान सुखदाई है, इसकी भुजा मेरे गलेमें मोतियों की मालाके समान शोभायमान है। अहा ! इसकी अचेत दशा भी मेरे मनको चैतन्य करनेवाली है। ' प्रेममोहिनी -- ( उसी दशामें ) है जीवितेश्वर ! । ज पके वियोगसे में प्राण छोड़ती आपका नाम सुना, मन, वचन, हूँ पर आपके चरण मुझसे नहीं छोड़े जाते । मैंने कर्मसे आपको स्वामी समझा। आपके सिवा कभी किसी पुरुषको पुरुष भी समझा हो तो सूर्य चन्द्रमा साक्षी हैं। आपने मुझको त्याग दिया परन्तु आपकी तरफसे मुझको कुछ खेद न हुआ क्योंकि पतिको स्त्रीपर सब तरहदा अधिकार होता है । हो !