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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/१०१

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( ८१ ) वर्णन है । शृंगार रस की सभी श्रंग- उपांगों की वहाँ शास्त्रीय व्याख्या है वहीं उदाहरणस्वरूप उसके सभी पक्षों का हृदयमाही उदाहरण प्रस्तुत है जो उसके काव्य की श्रात्मा है । संयोग और वियोग दोनों स्थितियों में सभी प्रकार के नायक नायिकाओं का सभी दशानों मे तथा सभी रूपों में चित्र प्रस्तुत किया गया है । विविध स्थितियों में मन की अंतर्दशाओं का ऐसा नयनाभिराम रूप प्रस्तुत किया गया है जो अंगदर्पण की मादकता को दीप्तिदान करता है। भाव की यह रूपशिखा उन तत्वों के सतत विकास का दर्पण के मूल में है । श्राख्यान करती है जो बीन बिंदु शास्त्र अनुसार उदाहरण प्रस्तुत करने में गद्य की नीरसता श्राने का भय सदा बना रहता है किंतु रसलीन के शिल्प की यह विशेषता है कि यदि उसके उदाहरणों को शास्त्रीय व्याख्या से अलग कर वे काव्य के अनुपम उदाहरण माने जाएँगे । यहाँ भी ने उन्हीं तत्वों का प्रयोग किया है जिनका प्रयोग उसने सॅजो दिया जाय तो रचना शिल्प में कवि है । इसके एक-एक वर्णन सजीव, सचित्र और सबक हैं। अंगदर्पण मे किया लगभग ११३ सौ दोहों में उदाहरण सबधी दोहे ४ || सौ के हैं वे सब के सब ऐसे अर्थ भरे है कि भाव स्वयं अपनी बात कह लेते है । जैसे- दीप तिहारे नेह को 1 बरत रहत हिय माहि । बात चहूँ दिसि की सहै बूमत कैसहुँ नाहि ॥' जहाँ सहज ही निर्विकल्प रूप से कवि ने ऐसे दोहों मे अपनी बात कह दी है वहीं वह कला की बारीकी से भी अपने को संकेतों मे कर देता है । कान परत मृग लोँ परेँ मुरलि ललन के कंठ ठुनुक नूपुर झुनुक दुहुन लही जब पूर्ण रूप से प्रकट प्रान । तान ॥ २ इतना ही नहीं, अपनी बात को अधिक सशक्त रूप में प्रकट करने का यत्न १. पृष्ठ १४६ २. पृष्ठ ३० ६