1 ( ८ ) 'पुरुष' > 'पूर्व', प्रगलभ' > 'प्रगल्भ', 'बच्छ' > 'वक्ष', च्छा, > 'रक्षा' जैसे तद्भव शब्दों को अपनाते हैं । अरबी और फारसी के जानकार होते हुए भी उनसे भी जो शब्द इन्होंने लिए हैं उनको भी श्रावश्यकतानुसार तद्भव रूप में ग्रहण किया है रौसन >> रौशन ( फा ), बोलियों के शब्द भी इसी । जैसे 'लह' > 'अल्लाह' (श्र), नेजा (फा)', इरोल > 'इरावल' ( फा ) इत्यादि । इन्होंने प्रकार प्रगृहीत किए हैं जैसे 'सियराइ' 'टकटोई', 'पोर', 'चाइँ' सतराई, लेस्ना, ऍड़ति इत्यादि । श्रेष्ठ रचना के लिये व्यापक शब्द भंडार चाहिए। यदि शब्दों का ठीक-ठीक प्रयोग करना कवि नहीं जानता, तो केवल व्यापक शब्द- भंडार का ज्ञान मात्र होने से रचनाकार श्रेष्ठ नहीं हो सकता । शब्द के अर्थबोध या उसके पय की अर्थछाया का ज्ञान कवि के लिये आवश्यक है। साथ ही उसका पद्य में प्रयुक्त पूर्वापर शब्दों से निगत, भावगत मेल भी परम श्रावश्यक है। ध्वनि से वातावरण ही केवल नहीं बनता | स्वर तथा भाव को रूप देने में भी सहायता मिलती है । इनके लिये श्रावश्यक है कि शब्द की ध्वनि का ज्ञान और पद की लयता का पूर्ण बोध कवि को हो । इसलिये छंद के साथ ही संगीत का ज्ञान भी अच्छे रचनाकार के लिये आवश्यक है। रसलीन तत्कालीन प्रचलित भाषाएँ - अरबी, फारसी, संस्कृत, रेखता के पडित तो थे ही। इसलिये उनका शब्दभंडार व्यापक था और इसीलिये वे अपनी कविता के लिये शब्दचयन में ऐसे कौशल का परिचय देते हैं कि उनके शब्द अपने स्थान पर अनगढ़ नहीं लगते। दूसरी श्रोर वे नाद करते हुए मिलते हैं जिसकी ध्वनि का साम्य उसके अर्थ से होता है और उसमे संगीतात्मकता भी प्रकट होती है । वे संगीत के अच्छे ज्ञाता थे । यह उनके निम्नांकित पद से स्पष्ट हो जाता है- भैरों कैसो सोहै रंग गोरी अग छाया संग सोहनी तरंग देत मेघ की बहार मैं । दीपक की नाक कत गुन करी फूलै बाँक मारौ नैन झाँक बस्यौ सारंग पहार मैं। धनासरी राग माँझ गावत ललित तान झूलत हिंडोले स्याम गहन फुहार मैं ।
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