सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/१०८

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

(==) नाने का यरन भी करते हुए कहीं कहीं दीखते हैं किंतु यह नवीनता स्वयं में इतनी संस्कारशील और दोषमुक्त है कि सहन ही ग्राह्य हो जाती है। माह्मता से कवि के संस्कार की शक्ति का बोध होता है। रसलीन में यह शक्ति पर्याप्त मात्रा में थी । यहाँ उनकी लोकोत्तियों श्रौर मुहावरों के कुछ उदाहरण दिए जा रहे हैं जो उपर्युक्त कथन के साक्षी हैं- कुछ लोकोक्तियों के प्रयोग लरिकाई सब ते भली जामै फिरिह निसक । ४६ / २१८ श्राली चाटे श्रोस के कैसे ताप बुझाय । ६१/३०४ काह कीजिए कनक ले जातें टूटे कान । ६५ / ३२४ तिहि तरुवर दहियत नहीं रतियत जाकी छाँह । १८८१ / ६७२ दोऊ ग पच्छीन को हनन एक ही चोट । २५३ / ११ ज्यों चोरी गुर पाइकै तुरत लीजिए खाइ । ६० / २६८ मोघट श्राग लगाइकै घट लै जल को जाइ । १०४ / ५३५ श्राली बानर हाथ मे पर्यो नारियर जाइ। १५८ / ८३६ महि ते वय होत है पापहि ते है होत । २०० / १०८२ । २०६ / ११४३ ज्यों कूकुर कुकुर लरै कौवा पावत दाव कुछ मुहावरों के प्रयोग द्योस चार कै चाँदनी । २२/६६ 'ऐ'ची फिरै' २७ / १२० कंट गई । २७/११७ 'करति दुराव' । २६ / १३३ भूख प्यास बिसराइ । ३३/१५० मुखस्त्रेत है जाइ । ३६ / १६७ 'नींद हिराइ' । ४० / १७६ सिर चढे । ४५/२१६ पीठ दै । ५५/२७० फूलि गयो... गात । ५७ / २८३ सेत ही बेची । ६२ / ३०६ सिर हत्या दीन । ७० / ३४५