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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/११

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( ७ ) सतसई के दोहों की अनुक्रमणिका भी है। उस पांडुलिपि से रसलीन की लिखावट की फोटो प्रति डा० जैदी के सौजन्य से यहाँ दी जा रही है। रखलीन यद्यपि देव नागरीलिपि के ज्ञाता थे तो भी ऐसा लगता है कि श्रभ्यास होने के कारण फारसी लिपि में ही अपनी रचनाएँ लिखते थे । मिफताहुल हिद के लेखक वासिल बिलग्रामों के अनुसार रसलीन फारसी लिपि में हिदी रचनाएँ लिखने के लिये ट, ड और ड़ अक्षरों के लिये तीन बिंदियों इन अक्षरों पर बनाते थे । काफ और गाफ के अंतर को स्पष्ट करने के लिये वे काफ को तो उसी प्रकार लिखते थे किंतु गाफ लिखते समय काफ पर एक और लकीर खींचने के स्थान पर उसके मरकज के सिरे को नीचे की ओर मोड़ देते थे जैसा कि नीचे स्पष्ट कर दिया गया है : روشک इसमे रसलीन के ग ट ड जीवन और साहित्य के संबंध में एक भूमिका, प्रत्येक ग्रंथ के समाप्त होने पर उसका विषयानुक्रम और छंदानुक्रम दिया गया है । पाठ के साथ शब्दों के अर्थ और पाठभेद तथा अंत में प्रथानुसार अलंकार- निर्देश, शब्दानुक्रम, नागरीप्रचारिणी सभा का सबद्ध खोज विवरण, महा- पुरुषों का परिचय, पौराणिक पात्रों, वस्तुओं आदि की अनुक्रमणिका भी दे दी गईं है। प्रेस की कृपा से तथा मेरी श्रसावधानी से प्रूफ की बहुत सी गलतियाँ मेल सकती हैं। उसके लिये मै क्षमाप्रार्थी हूँ । इस ग्रंथ के संपादन में मेरा ध्येय यह रहा है कि रसलीन हिदी जगत् के मुख उपस्थित हो जायें, ताकि उनके गुण के प्रकाश से साहित्य संपदा वृद्धि हो और ऐसे श्रेष्ठ कवि के सबंध में विद्वानों के संमुख ऐसी मग्री उपस्थित कर दी जाय जिसके आधार पर वे पठन पाठन की विस्था आगे बढ़ाएँ और ऐसे अन्य कवियों के ति से हो । श्रथा है, हमारा यह उद्देश्य सफल होगा । साहित्य का भी प्रकाशन