( ६० ) दूसरे को पुष्ट करने का भी सफल प्रयास किया है और कहीं श्रनेक अलंकार एक साथ ही श्रा गए हैं, जैसे सामान्या वन मे - भावे सब ही के पूरे करें काज जी के धनी उर बसै नीके एरबसी बनी है । रूप सुबरन एक रति हू न पूजै नेक धनी है मनी अनेक जाके श्रागे भनी है । दीखै जो रतन कोटि खान रसलीन जोत सोई के सुपट ओट दीपक लौं छनी है । श्रानन सरस बेधे पाहन से प्रान घने देखत के नैन यह होरा की सी कनी है । इसमे श्लेष, मुद्रा, उपमा, पंश्चम विभावना अलवार है। इस प्रकार की अलंकार- योजना स्थान-स्थान पर मिलेगी जो रसलीन के काव्य को संपुष्ट करती है । दोहरा, गाहा श्रादि के रसलीन के मूल दो प्रथ दोहों में हैं। स्फुट सवैया कवित्त और सरसी छंद का प्रयोग भी इन्होंने सीमित रूप से किया है । दोहा रसलीन का प्रिय छंद है। यह हिंदी का बहु प्रचलित श्रर्द्धसम मात्रिक छंद है । दूहा, दुहला नाम से भी यह ख्यात है । कालिदास और परवर्ती संस्कृत काव्य निर्माताओं का भी यह प्रिय छंद रहा है । प्राकृत पैंगलम मे इसकी श्रादि स्थिति है। इसके सबंध में विस्तार से परिशिष्ट में छद विमर्श के अंतर्गत विचार किया गया है। इस छंद की विशेषता ठीक-ठीक रहीम ने इस दोहे में प्रकट की है- दीरघ दोहा अर्थ के आखर थोरे आदि । ज्यों रहीम नट कुडली सिमिट कूदि चलि जाहिँ ॥ इस मर्म को रीतिकाल के श्रादि कवि कृपाराम ने समझा था और उसका मार्मिक तथा सार्थक प्रयोग मतिराम, बिहारी तथा स्वल्प तत्व से अधिकतम प्रभावनिष्पति कला का प्राण है रसलीन ने किया । और हिंदी छदों मे दोहा इसके प्रमाण हैं । रसलीन इसके सफल प्रयोक्ता हैं। प्रायः जितने दोहाकारू १. पृष्ट ३१८, ६ सं० ४५
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