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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/११८

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(ख) क्रिया विदग्धा — कौशल से - ( ६८ ) अपना कार्य करती है और युक्ति से संकेत करती है। स्वयं दूतिका भी इशारे से संकेत करती है और अपने तथा अपने प्रिय मे नई प्रीति रचती है। इन दोनों की विवि एक ही है । क्रिया विदया के निम्नां केत भेद है - - (क) पतिवंचिता -- श्रपने पति को देखते ही जो उपरति ( पर प्रेमी पुरुष ) के रस मे डूब जाय । (ख) दूती वचिता - दूती से सब कुछ छिराकर जो प्रेमी से मिलने का संकेत करे । (३) - लक्षिता- (ग) हेतु लक्षिता (घ) सुरति लक्षिता (ड) प्रकाश लक्षिता ( ४ ) - कुलटा (५) मुदिता (६) अनुशयना (मध्यम) (क) स्थानविघटना (ख) भाव संकेत सोचिता (ग) श्रनुशयना (१) स्वेनाधिष्ठित संकेत रचनानुगमन (२) स्थानाधिष्ठित संकेत वर्णानुगमन (३) पियमनोरथा स्वकीया परकीया बिना नेम के काम की दृष्टि से तीन प्रकार की होती हैं। - (१) कामवती (२) श्रनुरागिनी (३) प्रेमासक्ता सामान्या भेद - (१) स्वतंत्रा अपनी इच्छा से रमनेवाली । (२) जननी श्रधीना ( माँ या गुरुजन के अनुशासन मे रमनेवाली ) (३) नेमता सामान्या ( द्रश्य द्वारा रमने का समय जिनसे नियत हो ।)