( १०० ) (५) विभब्धा - वह नायिका जो शृंगार सजकर प्रियतम से भेंट करने जाय किंतु वहा प्रिय को न पाकर मन ही मन रुष्ट हो । (६) खडिता - प्रिय के शरीर पर रति चिह्न देख कर क्रोधित होने- वाली नायिका । (७) कलहतरिता -प्रिय से कलह कर पीछे पछतानेवाली नायिका | (८) विरहिणी - (क) जिसका पति परदेश गया हो । (ख) गमिष्यत् पतिका - कुछ दिन में जिसका पति परदेश जानेवाला हो । (ग) गच्छत्पत्तिका - जिसका पति प्रदेश जाने को ही हो । (घ) श्रागमिष्यत् पतिका - संदेश या पत्र द्वारा बिसा नायिका को पति के श्रागमन की सूचना मिल जाय । (ङ) श्रागतपतिका - जिसका पति विदेश से श्राकर मिले । (च) श्रागच्छत् पतिका -- जिसको अपने विछुड़े पति के आगमन का सदेश मिले । विरह होनेवाला है या हो चुका है, विरह समाप्त होनेवाला है या समाप्त हो चुका है श्रादि छहों एक ही में गिने जाते हैं । गुण होते हैं । किंतु 1 रसलीन का अभिमत हैं : इन नायिकाओं में मुग्धा का वर्णन उचित नहीं है, केवल विश्रब्ध नवोढ़ा में ये सातों प्रकार की पतिकादि में मुग्धा भी होती है की चाह के रस की दीपशिखा नहीं जलती । स्वाधीनपतिका - मुग्धा, मध्या, परकीया, सामान्या । वासकसज्जा - मुग्धा, मध्या, परकीया, सामान्या ॥ उत्कठिता-मुग्धा, मध्या, प्रौदा, परकीया, सामान्या । यद्यपि बिना दोनों अभिसारिका --मुग्धा, मध्या, प्रौढ़ा, परकीया में होती है और इसके परकीया में भेद है :- (क) कृष्ण भिसारिका (ख) शुक्ला या ज्योति श्रभिसारिका । (ग) दिवाभिसारिका ये सामान्या में भी होती हैं।
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