( १०३ ) सुरापान हेतु वारवधुनों के यहाँ नित घूमता रहे उसे सुरामच कहते हैं । रुपए के बल पर जो नगर नागरी ( वैश्या ) को वशीभूत किए रहता है वह घनमत्त नायक है । नायक प्रकृति गुण के अनुसार -- ( १ ) उत्तम -- अपने मान की चिता न कर मनुहार करनेवाला | (२) मध्यम -- उत्तम और श्रधम के मध्य । (३) श्रधम -- निर्लज्ज, निष्ठुर, स्वार्थी आदि । स्वभाव के अनुसार नायक भेद मानो एवं चतुर नायक-- इन दोनों - तथा शठ नायक में अतर है । मानी नायक के दो भेद है : (१) रूपमानी, (२) गुणमानी । चतुर नायक - जो सभी प्रकार से चतुर हो, वह चतुर नायक है । इसके दो भेद है - वचन चतुर एवं क्रिया चतुर । चतुर नामक के अंतर्गत ही स्वयंदूत नायक भी श्राता है। जब नायक अपनी नायिका का देश तज कर परदेश जाता है तो प्रोषित नायक कहलाता है । अनभिज्ञ नायक वह है जो संकेत की सज्ञा का जरा भी ज्ञान नही रखता । रस को दृष्टि से नायक के भेद रस की दृष्टि से नायक चार प्रकार के होते हैं- ( १ ) धीरोदात्त - जिसमें धैर्य की प्रधानता हो, जो दान, दया, समान और शुभ कर्मों के प्रति सदा उत्साही बना रहता है । उसका जितना प्रेम प्रियतमा के प्रति होता है उतना ही प्रेम धर्म के प्रति भी । (२) धीर प्रशांत - जिसके चित्र में निरतर शाति निवास करती है और मन शांति की बातों में ही रमता है । (३) धीरललित - जो श्राभूषण और वस्त्रों के प्रति विशेष दत्तचित्त रहता है और विषय की उद्दाम कामना जिसमें जगती रहती है । (४) धीरोद्धत - तनिक से दोष से जा क्रुद्ध हो जाता है, जिसमें श्रभिमान और श्रमर्ष भरा रहता है तथा जा स्वयं अपनी प्रशंसा करके प्रमुदित होता है ।
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