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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/१३०

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( ११० ) बीभत्स रस - घृणा का परिपोषक है। विरुचि, नींद, थूकना, मुख फेरना श्रादि अनुभाव है । देवता - महाकाल | रंग-नील । अद्भुत रस - श्राश्चर्य का परिपोषक है। नई बात देख सुन कर उत्पन्न होता है। बिना जाने चकित हो जाना अनुभाव है । देवता - ब्रह्मा । रग--पीउ । शांत रस -- निर्वेद भाव का पोषक है । यह गुरु या देव कृपा से उत्पन्न होता है । क्षमा, सत्य, देव पूजन, योगादि इसके अनुभाव हैं । देवता - विष्णु । रग -- चंद्र वर्षा | इन रखों के सामान्य परिचय और उनके उदाहरण के उपरांत भाव संधि, उनका उदय, शबलता, शाति एवं प्रौदोक्ति का उदाहरण दिया गया है। इसके बाद कवि ने इस रूप में नेम कथन किया है । गुरुजनों के सभी प्रछन्न प्रभाशवान हैं और वे प्रकट होते हैं। भूत, भविष्य, वर्त्तमान हुश्रा, होगा, होता है रूप में वर्णित होता है । सभी विशेष सामान्य हैं, उनका लक्षण ही विशेष होता है । यदि लक्षण से ही केवल विशेष कुछ होता है तो वह भी सामान्य ही है । जो रस स्वतः समुच्छित हो वह सच्चे अर्थ में रस है और जो रस दूसरे के कारण हो वह निःसत्व है । एकतरफा और तिथ के संमुख नर की, पूज्य से प्रीति और चोरी से रस रीति श्रधम है । साथ हँसी, बधू का अति उत्साह, शोक मैत्री दर्प रसाभास है । जहाँ भाव की पूर्णता नहीं है वहाँ भावाभास है । नायक नायिकाभास भी होता है उसी समय उन्हें घृणा छोड कर श्रय देवता से प्रीति, पिता, पुत्र, बालक बालिका, बंधु होता है स्थायी भाव, कृपा सत्य श्राद रहता है। रस जनित रस इस प्रकार होते हैं: - शृंगार से – हास्य, करुण रौद्र से, श्रद्भुत वीर से, बीभत्स से भयानक । इसके बाद लेख रम शत्रुवर्णन में छिन्न है शांतरस का प्रस्तावक अलग से कवि ने कहा है और फिर ग्रंथ की पूर्णता का वन किया गया है । 1 -