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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/१३२

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( ११२ ) मधुरखरं अपहसित सास्राक्षं विक्षिप्तांग रसखीन का कहना है : विहसितं सांसशिरः कम्पनावहसितम् । भवय तह सितम् ॥ -- सा० द०, ३।२१७-२१६ मद्धिम मैं होइ । बिधि जोइ ॥ - र० प्र०, दो० १०६० दसन खुलत नहि मंद मैं धुनि बहु हॅसिबो अतिहास मै ह्रास तीन 1 रसलीन ने रसों का क्रम भी दर्पणकार के अनुसार ही रखा है। शृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, श्रद्भुत और शांत । वे पूर्वाचार्यों के अनुसार ही कहते हैं : काव्यमते ये नव रसहु बरनत सुमति बिसेषि । नाटक मति रस आठ हैं बिना सांत श्रवरेखि || इसे धनंजय ने इस प्रकार कहा है : र० प्र०, दो० ५८ 'शममपि केचित्प्राहुः पुष्टिर्नाख्यषु नैतस्य ।' रुद्रट भट्ट ने कहा है : श्रृंगार हास्य करुणा रौद्रवीरभयानकाः । बीभत्साद्भुतशान्ताश्च काव्ये नवरसाः स्मृताः ॥ - दशरूपक -शृं० ति० १२६ रुद्रभट्ट ने मुग्धा के चार भेद कहे हैं : (१) नववधू, (२) नवयौवना, (३) नवानंगरहस्या और (४) लज्जाप्राय रतिः मुग्धा नववधूस्तत्र नवयौवनभूपिता । नवानङ्गरहस्या च लज्जाप्राय रतिस्तथा || - श्रृं० ति०, १४८ १. श्रृंगारहास्य करुणा रौद्र वीर भयानकाः | बीभत्सोदभुत इत्यष्टौ रसाः शान्तस्तथा मतः ।। - सा० द० ३१८२