( ११८ ) चंद्र छत्र धरि सीस पै लहि श्रनंग उपदेस । कमल अस्त्र गहि जीति जग कीन्हों सरद नरेस || ---शरद्, ५८७ श्रवण्यों के ग्रहण में रसखीन ने कितनी श्रभिनव सूझ का परिचय दिया है, जिससे चित्त चमत्कृत हो उठता है । इनके कितने ही प्रस्तुत वर्य के समान ही चित्ताकर्षक हैं । कतिपय की बानगी लें : ऐसे कामिनि लाज ते पिय पै जैसे सरिता को सलिल पवन सामुहे अठकति जाइ । पाइ || र० प्र० ३६० पिय तन नख लखि जो करत तिय बेदन अबिदात | कछू खुलति कछु नहि खुलति तू तुरकी सी बात || ४०६ सलोन का मूल्यांकन दे सर्वात निरूपक श्राचार्य न होते हुए भी रसलीन ने जिस अंग को अपनाया है उसमें पग पग पर उनकी मौलिक सूझ और प्रतिभा की छाप ने इस शास्त्रीय विषय को भी विलोभनीय और उनके स्वतंत्र चिंतन ने परंपरा- भुक्त विषय को भी नया रूप दिया है । प्रायः यह परिपाटी चल चुकी है कि रीतिकाल के कवियों की श्रालोचना करते समय समीक्षक उनके अन्य पूर्ववर्ती और परवर्ती कवियों से उनकी तुलना करते हैं। तुलना करने से मूल्याकन को जहाँ बल मिलता है वहीं विज्ञान की भाँति साहित्य की स्थिति न होन के कारण न्याय सुचारु रूप से नहीं हो पाता है । इसलिये तुलनात्मक समीक्षा से बचने का यत्न गंभीर लोग करते हैं । श्राचार्य शुक्ल ने भी इसी कारण से तुलनात्मक समीक्षा को हेय समझा है । यहाँ रसलीन की उपलब्धियों को प्रकाशित करने के लिये किसी अन्य पूर्ववर्ती कवि के काव्य की तुलनात्मक समीक्षा प्रस्तुत करना मेरा ध्येय नहीं है । रीति काल के केशव, देव, मतिराम, भिखारी दास श्रादि सभी पूर्ववर्ती और समसामयिक कवियों के काव्य की अपनी मौलिक विशेषताएँ हैं । श्रनेक स्वल्प ख्यात पूर्ववर्ती कवि भी अपने गुण धर्म के कारण शतियों के उपरांत भी श्राज जीवित हैं और रसलीन की महिमा की मर्यादा की सीमा को लांघ कर ऐसा श्राख्यान भी नहीं करना चाहता कि उनके प्रति पक्षपात हा नायः
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