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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/१४४

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ऋणनिर्देश रसलीन का मान 'श्रमी हलाहल मद भरे' वाले एक दोहे के कारण बैसे ही प्रतिष्ठित था जैसा रत्नों के क्षेत्र में कोहनूर का है। सभी रसलीन को जानते थे और मानते भी थे और इतिहास ग्रंथों मे इनकी चर्चा भी की जाती रही है, पर इनकी समस्त कृतियों एक साथ कभी सामने नहीं आई । समय समय पर इनके कृतित्व की शिवसिह सरोन से लेकर हिदी-- साहित्य के बृहत् इतिहास तक में चर्चा की गई है। सभा ने अपनी खोज रिपोर्टों में भी इनके संबंध मे उपलब्ध विवरण प्रस्तुत किए हैं। इस कवि की श्रोर गंभीर रूप से ध्यान नागरी प्रचारिणी सभा का तब गया जब स्वर्गीय राष्ट्रपति राजेद्र प्रसाद जी की प्रेरणा से सौ ग्रंथावलियों के प्रकाशन की योजना बनाई जाने लगी। एक शत कवियों मे रसलीन का नाम स्वतः श्रा गया। इसी बीच श्री संपूर्णानंद अभिनंदन ग्रंथ में रसलीन का विस्तृत जीवन- बृत और परिचय प्रकाशित कर भूतपूर्व न्यायाधीश रसलीन की ओर हिदी जगत् का ध्यान आकृष्ट किया और उन्हें ही इस ग्रंथावली के संपादन का भार सौपा गया। उनके पास रसलीन के कुछ इस्तलेख भी हैं। यदि वे यह कार्य करते तो संभवतः और अच्छा करते और हिदी का अधिक उपकार होता किंतु कार्यव्यस्तता के कारण बहुत समय व्यतीत हो जाने पर भी यह कार्य संभवतः वह पूरा न कर सके । श्री गोपाल चंद्र सिंह ने बिहारी सतसई (लाल चंद्रिका से युक्त) के संपादन का कार्य सभा ने मुझे सौपा। उसे प्रस्तुत करते समय विशेषकर 'श्रमी हलाहल मद भरे' वाला दोहा बिहारी का है या नहीं इनकी जॉच पड़ताल करते समय कृपाराम और रसलीन ने मेरे मानस को अपनी ओर आकृष्ट किया । कृपाराम की हिततरं- गिणी विश्व भारती, नागपुर से प्रकाशित हुई और रसलीन ग्रंथावली, हिदी प्रचारक पुस्तकालय वाराणसी से सात आठ वर्ष पहले प्रकाशित होने की बात स्थिर हुई। राष्ट्र कुल शिक्षा एकक के निदेशक डॉ० वेणीशंकर झा उन दिनों लंदन में थे और रसलीन के इस्तलेख की फोटो कापी उन्होंने वहीं