€ 'रसलीन' रस-वर्णन बरनि' मंगलाचरण श्ररु कविकुल को अब श्रानि । रस कर बरनन करत हौं ग्रंथ मूल जिय ग्रंथ मूल जिय जानि ॥ २८ ॥ रस- लक्षण 1 स्रवन सुनत रस सब्द को ग्रंथनि' देख्यौ जाइ । रल लच्छन तिनके मते समुभि परयौ यह श्राइ ॥ २६ ॥ २. जब विभाव अनुभाव' श्ररु विविचारी ते २ श्रानि । परिपूरन थाई जहाँ ऊपजै सब रस जानि ॥ ३० ॥ रस-रूप जो धाये' रस बीज विधि मानुस चित छिति माहिं । थाई, कहि जाहि ॥ ३१ ॥ ताके अंकुर जो कछू सो २. को ( १, ३ ) । २८ – १. बरन ( २, ३ ), २६–१. ग्रथन ( २, ३ ३०—१. अनभाव ( १ ), ४. सो ( २, ३ ) । ३१ – १. थायी ( २, ३ ), ( ३ ), ५. वाह ( ), ३ २. जाय ( २, ३ ), ३. श्राय ( २, ३ ) । २. व्यभिचारी मिलि ( ३ ), ३. व्यापी ( ३ ), २. मानस ( ३ ), ३. माह ( १, ३ ), ४. ताको ) वाहि ( २ ) जाह ( १ ) । २८ - बरनि वर्णन कर । कविकुल= कविवंश | अनि = गौरव, मर्यादा | २६- स्रवन = श्रवण, कान । लच्छन = लक्षण, गुण-धर्म । ३० – विभाव = भाव के तीन अंगों मे से एक; वह श्रवस्था जो मन मे किसी भाव को उत्पन्न या उदीप्त करे । श्रनुभाव = मनोगत भाव की सूचक बाह्य क्रियाएँ । विविचारी = ( व्यभिचारी) संचारी भाव, एक प्रकार के भाव जो स्थायी न रह कर सभी रसों में सहायक रूप मे संचरण करते है । थाई = ( स्थायी ) भाव का एक प्रकार जो मन मे बना रहता है और परिपाक होने पर रसावस्था में परिणित हो जाता है । - ३१ – धाये = (ध्याना ) स्मरण किया, धारण किया । विधि = शास्त्र सम्मत व्यवस्था | छिति = पृथिवी । अंकुर = नवोद्भिज, खुना ।
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