रसप्रबोध १२ ज्यों श्रनुभाव । तन विविचारिन थाइयन' प्रगटै ज्यों सहचारी थाईन के मन विविचारी नौ थाई अरु आठ तन विविचारी" तैंतिस मन विविचारियन मिलि हैं भाव स्थायी भाव - लक्षण जब भावन मैं यह लख्यौ बाई है aa raat" प्रथमै करयो वरनन तब जो रस सनमुख' है तेहि बदलनि को जा रस सनमुख जो १ है कछू बदतै सहज परकास" । भाव ॥ ४३ ॥ पचास ॥ ४४ ॥ रखमूल । अनुकूल ॥ ४५ ॥ ॥ सहज सुभाव । कहते हैं कविजन थाई भाव ॥ ४६ ॥ कछू तनक बदल हिय । होइ' । ता रस को थाई वहै यह बरनत कवि तोइ ॥ ४७ ॥ स्थायी भावो के नाम रति हाँसी श्ररु लोक पुनि कोप' उछाह सु श्राति । भय" वृण श्रचरज" समुझि पुनि निरवेदहि थिर' जानि ॥ ४८ ॥ ४३ - १. भाय इन ( २ ) नवाइन ( ३ ), २. सो (२, ३), ३. धनभाव ( १ ), r सर्वत्र व्यभिचारी ( ३ ) विभचारी ( २ ) विविचारी के स्थान पर । ४४ - ( ११ ) बिभुचारी परगास ( २ ), व्यभिचारी परगास ( ३ ), २. व्यभिचारिन ( ३ ), बिभचारिन ( २ ) । ४५–( १···१ ) बरन करौ प्रथमै ( २, ३ ) । ४६ – १. सन्मुख ( ३ ), २. तिन ( २, ३ ) | ४७ – १. होय ( २, ३ ) । २. लोय ( २, ३ ) । ४८ - १. क्रोध (२, ३), (२२) भै घिन चिर ( १ ), ३. जिय ( २, ३ ) | ४३ - सहचारी = सहचारी भाव । ४७ -- सनमुख = सम्मुख । लोइ = लोग । ४८ - रति = रति-श्रृंगार का स्थायी भाव शोक = करुण रस का स्थायी भाव उछाह = वीर रस का स्थायी भाव | । हाँसी = हास्य रस का स्थायी भाव । । कोप = रौद्र रस का स्थायी भाव । भै= ( भय ) भयानक रस का रस का स्थायी भाव । श्रचिरज = स्थायी भाव । घिन = ( घृणा ) बीभत्स ( आश्चर्य ) अद्भुत रस स्थायी भाव । निरवेद=शांत रस का स्थायी भाव ।
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