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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/१६३

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रसप्रबोध १८ तीनो गुणों का उदाहरण लखि मीन । रसलीन ॥ ७६ ॥ मुख सखि निरखि चकोर अरु तन पानिप' पद पंकज देखत भंवर होत नयन गिरिजा सिव तन मैं रही कमला हरि हिय तू तन हरि पिय हिय बसी हिय हरि प्रानन सिन्धु ते रतन चतुर्दस सिन्धु तैं एकै तुही नायिका भेद सुरन निकारे' वेधा मेघहु' पाइ' । जाइ ॥ ७७ ॥ । जोइ । बिलोइ ॥ ७८ ॥ पतिहि सौं' जिहि प्रीति सो सुकिया सलज सुरीति । परकीयहि" पर पुरुष सों गनिकहि घन सों प्रीति ॥ ७६ ॥ ७६- १. तनयानय ( २, ३ ) । ७७ – १. पाय ( २, ३ ), २. जाय ( २, ३ ) । ७८ - १. निकारै ( १ ), २. चतुरदस ( २, ३ ), ४. मेधा ( २, ३ ) | ७६–१. जो ( ३ ), २. जेहिं ( १ ), ३. स्वकिया (२, ३) ४. सरीति परकीया ( २, ३ ), ६. धनकहि ( २, ३ ), ७. सौ ( २, ३ ) । ( ३ ), ५. अनुपम | मनहरनी = मन हरनेवाली । कमला = रूपवती स्त्री, लक्ष्मी । बानी = वाणी, सरस्वती - कवि भूप = कविराज । ७६ – ससि = ( शशि ) चन्द्र । पानिप= ( पानी + प ) कांति, चमक, पानी । --- मीन - मछली । पदपकज = चरणकमल । भँवर = भ्रमर । रसलीन कवि का = नाम तथा रस मे डूब जाने का भाव । ७७ - हरि = श्री विष्णु, हर कर । ७८ - सुरन = ( सुरों), देवताओं । निकारै = निकाला। रतन चतुर्दस= लक्ष्मी, कौस्तुभमणि, रंभा, वारुणी, सुधा, दक्षिणावर्ती शंख, ऐरावत हाथी, धन्वन्तरि, धनुष, विष, कामधेनु, कल्पतरु, चन्द्रमा, उच्चैःश्रवा घोड़ा । बेधा = ब्रह्मा, शिव, विष्णु, सूर्य । मेधहु = धारणा शक्ति, सरस्वती का एक रूप, बल या शक्ति | बिलोइ = मथकर । ७६ - सुकिया = स्वकीया । सलज = लज्जाशील । सुरीति = ( सु + रीति) सुन्दर रोति । परकियहि = परकीया को । गनिकहि = धन-लोभ से नायक से प्रीति करनेवाली नायिका । धन सोधन से, संपदा से ।