२३ 'रसलीन' नवल वधू- मुग्धा सौतिन मुख निसि कमल भे' पिय चख भए चकोर । गुरजन मन सारंग भये लख दुलही मुख ओर ॥ ६८ ॥ तुव दीपति के बढ़त हीं हरि लीनो मन हग खोले वोले कहा अब हरि लै हौ नवल वधू के दो भेद पीय । जीय' ॥ ६६॥ है नवोढ़ पति संग जो सोवति श्रधिक डराइ | श्ररु विस्रन्धनबोढ़ जो पति कौ नेकु पत्याइ ॥१००॥ " " नवोढा - उदाहरण २ खखी' कहे लालाभरन नैकु न पहिरति बाम | मन ही मन सकुचति" डरति" मरति" लाल के नाम ॥ १०१ ॥ मोर मुकुट धरि एक सखि बधू दिखाई छांह | भगी पन्नगी लौं लपकि घाइ लगी" उर मांह ॥१०२॥ ६८ - १. भो ( २, ३ ), २. गुरुजन ( २, ३ ), सागर ( २, ३ ), ४. दुलहिन ( २, ३ ) । ६६ - १. तिय ( १, २ ) । १००-११. जो पति सो कछु पतियाय ( ३, ३ ) । १०१ – १. सखिन ( २, ३ ), २. लल प्रामरन ( २ ) चल ग्राभरन ( ३ ), ३ नेकु ( १ ), ४ ४. सकुचत, डेरति ( १ ), ५. भजत ( २, ३ ) । १०२ – १. लो लपक लगी धाइ ( १ ) - सौतिन = सौत का । निसि - कमल = रात्रि का कमल ( संकुचित, मलीन ) | गुरजन=बडे, बूढे | सारंग मोर, दीपक | १६ - हरि लै हो जीय = अब प्राण लोगे । १०० - पत्याइ - ( पतियाय ) पतियाती है, विश्वास करती है । = १०१ -लालाभरन = ( लाल + आभरन ) लाल का या लाल रंग का आभूषण । १०२ - पन्नगी = सर्पिणी ।
पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/१६८
दिखावट