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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/१७९

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रसप्रबोध ललन गहत सुख ते' गयौ' मोह नींद लौं छाइ । " ३४ मार करन की सुधि अती जागी भोरहिं श्राइ ॥ १५३ ॥ प्रौढा का मुड़कर बैठना पिय चितवत तिय मुरि गई कुलहित पट मुख लाइ । श्रमी चकोरन के पियत घन लीन्हों' ससि छाइ ॥ १५४ ॥ प्रौढा का सुरतारभ करति कुच परसत मतराति' । बढ़ाइ कै रुचि उपजावति जाति ॥ १५५ ॥ बाह गहत सीबी तिय र निज महत प्रौढा की सुरति श्रलिंगन चुंबन दंपति रति रसे करत कोक कलन' के घात । लेत हूँ कहूँ न नैकु कहूँ न नैकु श्रघात ॥ १५६ ॥ घन माँह ॥ १५७॥ यौं उर" लागत" सेज ते बाम स्याम गहि बाँह । ज्यौं बिजुरी घन सेत की दुरै श्रसित १५३ - १. मुख तो ( ३ ), २. गयो (२, ३), ३. जगी भोरहीं ( २, ३ ) । १५४ - १. लीनौ २, ३ ) । ' १५५ - १. सनरात ( २ ) इतरात ( ३ ), २. पिय ( २, ३ ), ३. ऊजावति जाय ( २, ३ ) । १५६ - १. कलिन (२, ३), मैं ( २ ), ३. नैक ( २, ३ ) | १५७ - ११. उरि लागति ( २ ), उरि लागत ( ३ ) | १५३ - मोह नींद - मोहनिद्रा । भोरहि= तडके, सबेरे । १४४ - कुलहित=कुल के लिए, कुल की गौरव रक्षा के लिए । श्रमी = श्रमृत । १५५ – सीबी = 'सीसी' शब्द, सिसकारी । परसत = स्पर्श करने पर, छूने पर । महत = महत्व | १५६ - कोक - कलन = रतिविद्याओं । दंपति = स्त्री-पुरुष का जोड़ा । श्रघात तृप्त होते हैं । १५७ - घन - शरीर, बादल । सेत= गौर, श्वेत । श्रसित = अश्वेत, काला, कुटिल |