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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/२०५

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रसप्रबोध ६० परकीया का सुरतारभ मो कर दोऊ भरि दिये मनचीते फलु' अलप वृक्ष की छाँह इनि किन्हें कलपतरु बैन' मिलत मुख में हिय लावत कछु सुधि श्राजु । काजु ॥ २६६ ॥ बली मुखुरे बोलत हिय श्रइ । नहीं कित गइ लाज लगाइ ॥ २६७॥ परकीया की सुरति यौं' बँकेत सुख लखत ज्यौं चोरी गुर पाइ' हरि पिय श्रातुर गरि ल्याइ । के तुरत लीजिये खाइ ॥ २६८ ॥ . राधा तन फूलन मिल्यो' पातन' हरि गो गात । नूपुर घुनि खग घुनि मिली भले बने सब भाँत ॥ २६६ ॥ परकीया का सुरतात ॥ फूल माल सो बात जो मैं ल्याइ' उभराइ । ऐसी श्रंग लगाइ लगाइ सो कत डारी कुँभिलाइ ॥ ३००॥ २ε६–१. फल ( २, ३ ), २. इन ( १ ), ३. कित्रे ( २, ३ ) । २६७ - १. बेन ( १ ), २. मुख (२, ३ ), ३. भगाइ ( २, ३ ) । २६८ - १. यो ( १ ), २. लेत ( २, ३ ), ३. लाइ ( २, ३ ), ४. पाय ( २, ३ ) । २६६ -- १. मिलो (२, ३ ), २. या तन ( ३ ), ३. सात ( २, ३ )। ३००- १. लाइ ( १ ) । २६६ - मनचीते = मनचाहा । श्रलप= अल्प, थोड़ा। कलपतरु = कल्पतरु, समुद्र- मंथन से निकले चौदह रखों में से एक जिससे की गई सभी याचनाएँ पूर्ण होती है । २१७ - चैन = वचन, । सुधि= स्मरण, चेत, याद । २३८-गुर = गुड़ | २३६ - मिल्यौ = मिल गया । नूपुर धुनि=नुपुर की ध्वनि । भले बने= श्रच्छे बन गये । -३००-उभराइ= उभाड़ कर । डारी = डाली ।