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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/२०६

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६१ 'रसलीन' पट भारति' पौछति बदन सुंदरि दरपन हेरि । दूती खों श्रनुखाति है लाजवती हग फेरि ॥ ३०९ ॥ सब जग हारयौ ये कुंजन मैं रति के अलख काहू को न लखात । दोऊ पंछी लौं उड़ि जात ॥ ३०२ ॥ स्वकीया परकीया बिना नेम कथन सुकिया परकीया दोऊ बिना नेम परमान । कामक्तो अनुरागिनी प्रेम असकता? जान ॥ ३०३ ॥ कामवती उदाहरन श्राली चाटे श्रोस के कैसै कत मो कर लावत कुचनि कत गहियत 3 लपटायर | ताप बुझाय ॥३०४॥ ३०१-१. भारत ( १ ), २. पोछत ( १ ) । ३०२ – १. पै ( २, ३ ), २. लो ( २, ३ ) । ३०३ - १. स्वकिया ( २, ३ ), २. असक्ता ( २, ३ ) । ३०४ – १. कुचन (२, ३ ), ४. प्यास ( २, ३ ), ५. २. लपटात (२, ३), ३. वोस ( १ ), बुझात (२, ३) । • ३०१ – हेरि = देखकर, ताककर । श्रनुखाति = क्रोध करती है, रुष्ट होती है। - लाजवती = वजाशील नायिका । ३०२ – अलख = जो न देखा जा सके । हारथौ = हार गया । काहूको किसी को । मैं= मे । ३०३ - सुकिया = स्वकीया, विनय श्रादि गुणो से युक्त, गृहकर्म परायण, पतिव्रता स्त्री । शील, संकोच, स्नेह, सौजन्य और सौंदर्य श्रादि गुणो से युक्त सती, पार्वती और सीता के समान मन, वचन और कर्म से प्रेम करनेवाली स्त्री । परकीया = पति के रहते दूसरे पुरुष से सबंध रखनेवाली नायिका | नेम= नियम, कायदा | असकता = श्रासक्त, अनुरक्त, लीन, मोहित । ३०४ – गहियत = पकडते हो, ग्रहण करते हो । श्रोस= वायु मंडल मे मिली हुई भाप जो रात की सरदी से ठंढी होकर जलबिंदु के रूप मे पदार्थों पर लग जाती है, शबनम |