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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/२१

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प्रस्तावना देशकाल हिंदी साहित्य के मध्यकाल का इतिहास इस देश की सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक एव श्रार्थिक परिस्थितियों का परिणाम है । साहित्य एकांतिक कृति होते हुए भी, अपने देशकाल की चेतना के श्रालोक से जीवन एवं प्रभावान होता है | हिंदी साहित्य ही नहीं, विश्व का प्रत्येक जीवंत साहित्य इस तथ्य का साक्षी है। कबीर, जायसी, सूर, तुलसी, मीरा श्रादि हमारे साहित्य की अनन्य श्री संपदामय विभूतियाँ इसका प्रमाण हैं । भक्ति एवं संत साहित्य की महान् रचनाओं के उपरात मध्य काल के उत्तरार्ध में हिंदी- साहित्य की धारा जिस देश और काल से प्रवहमान हुई रसलीन उसके एक प्रभोज्वल नक्षत्र हैं । उनके देश काल जीवन की मर्मोत वाणी उनके साहित्य का श्रमृत है । मुस्लिम सत्ता, सभ्यता और संस्कृति सभ्यता और संस्कृति का मूलाधार में विकसित संस्कृति थी, जो वहाँ के राजनीतिक स्थिति के परिणामस्वरूप भारत में मध्यकाल का प्रारंभ देश में के प्रवेश के साथ श्रारभ होता है । इस पश्चिमी मध्येशिया में इस्लाम की छाया शताब्दियों के आर्थिक, सामाजिक और मूर्त हुई थी। भारत की सामाजिक, सांकृतिक, श्रार्थिक तथा राजनीतिक स्थिति उनसे सर्वथा भिन्न थी और प्रवद्धमान मुस्तिम सभ्यता की उसकी जीवनीशक्ति क्षीण हो गई थी । इसलिये शासन के सामने एक भयकर स्थिति थी । यद्यपि इतिहास में एक से एक महान् मुस्तम योद्धा और प्रशासक हुए तो भी अकबर के पूर्ण तक एक भी ऐसा कुशाग्र राजनीतिज्ञ क्रांतदर्शी मुस्लिम शासक न हुआ जो तात्कालिक सामाजिक स्थिति पर पूर्ण नियन्त्रण स्थापित कर पाता । यद्यपि अकबर द्वारा स्थापित व्यवस्था देश में सैकड़ों वर्षों तक चलती रही तो भी औरंगजेब के समय तक उस व्यवस्था में १. शासनकाल - सन् १५५६ - १६०५ ई० ।