६५ उदाहरण 'रसलीन' मोहिं रावरे हाथ दे धन कीन्हौं' जिन 3 अब छूटत वह पापिनी छुट्यौ न वाको हाथ । साथ ||३२०|| वित हित बाढ़त नेह' यह बॅध्यौ जीय' सुख पाइ । अब अलि छूटत होत दुख कीजै कौन उपाइ ॥ ३२९ ॥ सामान्या का सुरतिश्रारभ बरनि कहत है' बार तिय रति" आरंभन कोइ । सुख श्रौरनि की सुरति को याके प्रथमहि होइ ॥ ३२२ ॥ सामान्या की सुरति सुरति रंगिनी यों लपकि धनी गरे लपटाइ । ज्यो तरंगिनी' सिन्धु को करि तरंग मिलि जाइ ॥ ३२३ ॥ सामान्या का सुरतात नये रसिक देखे नये नये लेत लेत तियन' के प्रान । काह? कीजिये कनक लै जाते टूटे कान ॥ ३२४॥ )। ३२० – १. कौनों ( २, ३ ), २. जिनि ( १ ), ३. पापनी (२, ३ ) ३२१– १. नेम ( २, ३ ), २. जीव ( २, ३ ), ३. छुटवत ( २, ३ ) । ३२२ - १. सकत से ( २, ३ ), २२. यह तिय रंभ को होइ ( २, ३ ) । ३२३ – १. तरगनी ( २, ३ ), तरंगिणी ( १ ) । ३२४ – १. त्रियन ( २, ३ ), २. कहा ( २, ३ ) । ३२० – रावरे = श्रापके | छुट्यौ=छूटा | वाको=उसका | 1 ३२१ - वितहित = वित्त के लिए । जीय हृदय मे । ३२२ - बरनि = वर्णन कर । बार=वाली । सुरति = केलिप्रसंग | याके= इसके | ३२३ – सुरवि रंगिनी = कामकलामे रँगीली नायिका | धनीगरे=धनवान् के गले से । तरंगिनी = नदी । ३२४- काह = क्या । ५
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