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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/२३९

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रसप्रबोध जेहि' मृगनैनी को रहै नृत्त गीत मैं चोप सदा पिय चित्र सों वह चित्रिनी चित्रणी- उदाहरण ૨૪ ध्यान । सुजान || ४७२ ॥ पाई । तिय निजु' पिय को चित्र मैं सोतुष दरसन गाइ गाइ नृचति रहति भाँति भाँति के भाइ || ४७३|| मित्रन" चितवत है पत्री हेरति है कहा " चित्र रही चितुर कोऊ कोऊ पतरो पतरो सनमुख लाइ । । पाइ || ४७४ || सखिनी - लक्षण देह छीन मोटो नर्सों कुच लघु निलज निसंक । कोपवती नख " श्रंक ||४७५|| उदाहरण संदेह । गेह ||४७६ ॥ देह रति संखिनि पीकौ सनक' हियो लखि लाल को यह मन होति नखन खोदि चाहत जियो लालन को मन ४७२ – १. जिहि (२, ३ ), २. में ( २, ३ ) । ४७३ – १. निज ( २, ३ ), २. सैतुष ( १ ), - ४७४–११. चितवत कहीं ( १ ), २. चित ( १ ), ३. पत्री ( २, ३ ) । ४७५ – १०१. नख दत रुचि ( १ ) | ४७६—१. सनख ( २, ३ ), २. होत ( २, ३ ), ३. निरवन ( १ ), ४. के हिय ( २, ३ ) । चतुर, सुविज्ञ । ४७२ - चोप = चिपकनेवाली वस्तु, लासा, । चित्रिनी = कामशास्त्र में माने स्त्रियों के पद्मिनी आदि चार भेदों मे से एक ( यह कलानिपुण और हुए बनाव सिंगार की शौकीन होती हैं।) सुजान ४७३ - सौतुष = सन्मुख, प्रत्यक्ष । नृत्तति = नाचती है, नृत्य करती है ४७४-- चितवत = देखती । हेरवि= ढूढ़ती है। पतरी = पत्तल । ३७५ - कोपवती = क्रोधी । अंक = गोद, कोरा । ४७६ – सनक = पागलपन । 1