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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/२४०

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૫ 'रसलीन' हस्तिनी - लक्षण थूल श्रंग लोभन छयो गोरी भूरे केस । गजगौनी उरगंधिनी' यहे हस्तिनी " भेल ॥४७७॥ उदाहरण ऐडाति । ठेगनी' मोटी गोरटी जोबन मद सखिन संग गजगामिनी चली ठान सो जाति ॥ ४७८ ॥ नायिका - भेद लोक-भेद के अनुसार इंद्रानी दिव्या कहै नर तिय' कहै श्रदिव्य | aिय लौ जो तिय श्रतरे सो कहि दिव्यादिव्य ॥ ४७६ ॥ नेम-वर्णन कामवती अनुरागिनी प्रौढ़ा प्रौढ़ा भेद ज्येष्ठ कनिष्टा हूँ बिषे मानवती जिय तिय श्रभिलाष दसा भई लालस मती . ताहि वृत्तके मति कहै " चुंबन श्रादि प्रमानि' । जानि ॥ ४८० || कहाइ । घिनाइ ॥ ४८१ ॥ ४७७ - १ उररीधिनी (२, ३ ), २. मानि ( २, ३ ), ३३. हसतहि यह भेद ( २, ३ ) । ४७८ - १. रॅगनी ( १ ) । ४७६ - १. चित्र ( १ ) ४८० – १. प्रमान ( २, ३ ), २. कनिष्टा हुॅ ( २, ३ ) । ३. जान ( २, ३ ) । ४८१ - ११. सो मति कहत है ( २, ३ ) । ४७७ – छ्यो = छाई हुई । गजगौनी = हथिनी की तरह चलनेवाली । ४७८ — ठेगनी = ठिंगनी, छोटे कदकी । ऐंडति = अँगड़ाई लेती है, इतराती है। ४७६ - इन्द्रानी = इंद्र की पत्नी । दिव्या = लोकोत्तर गुणों से युक्त श्रमानुषी नायिका । नरतिय = मानुषी । श्रौतरे = अवतार लिया । ४८० – प्रमानि = प्रमाणित । ४८ १ - लालसमती = लोलुपा, चंचला, किसी चीज को पाने की प्रबल इच्छा वाली । वृत्तके = विहित नियम के । घिनाइ = घृणा करती है ।