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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/२४४

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w ६६ w 'रसलीन' पैंतिस ऊपर नारि के और बैस को लाइ । नहिं बरनत रस ग्रंथ में गौरी पूजन जोग है यह कवि कहत बनाइ ॥ ५०१ ॥ लक्ष्मी योग समर्थ । बहुरि सरस्वति जानिय मतो मतो पूछिए अर्थ ॥ ५०२ ॥ ताहि लच्छिमी बैस मैं सुकिया तेरह जानि । तामें मुग्धा पाँच'... विधि भरत मते पहिचानि ॥ ५०३ ॥ पुनि मध्या है चारि बिधि प्रौढ़ा हूँ है' चारि । उर धारि ॥ ५०४ ॥ ॥ होइ । जोइ ॥ ५०५ ॥ सो इनि तेरह भेद मैं मुग्धा ये प्रथम अंकुरित यौबना तीन मास लौं नवल बघू षटमास लौं यह निश्चै' जिय बहुरि चौदहें बरस पुनि नव नव यौवना निवास । पंद्रह बरस करत परकाल ॥५०६ ॥ नवल अनंगा होय सोरहे बरस मैं अब मध्या को बरन पुनि प्रौढ़ा कहौं पुनि सलज्ज रत नारि । विचारि ॥ ५०७ ॥ कहे कवि नाह ॥ ५०८ ॥ मध्या नूढ़ा जोबना बरस सत्रहे माह । प्रकटै मदन अठारहें बरस ५०२ – १. १. बुझिए ( १, २ ) । ५०३ - १. पुनि ( १ ) । ५०४ - १. पुनि (२, ३ ) । ५०५ -- निःचै ( १ ) । ५०७ – १. पै ( १, २ ), २, कहीं ( २, ३ ) । ५०८ - ( २, ३) प्रतियों में यह नहीं है । ५०२ - पूजन = पूजा करने के मतो = मत, नहीं । 1 ५०३ --- भरतमते = आचार्य भरत के मत से । 1 · ५०५ - अंकुरितयौवना = वह स्त्री जिसमें यौवन के चिह्न प्रकट हो चुके हों । ५०६ - बहुरि = फिर, पीछे, अनतर । नवल नंगा = जिसके मन में नया नया काम जागा हो । ५०७ - सलज = लज्जाशील । १०८ - कविनाह = कविनाथ, कवियों में श्रेष्ठ ।