रसप्रबोध पिय सौतिन के नेह मैं घने सने हैं याते पानिप लाज को केहू बिधि ठहरै अनुकूलादि भेट मे वैसिका से भी उपपति हो सकने का कथन नैन । १०४ न ॥ ५३१ ॥ श्रहि । 1 अनुकुलादिक ये चतुर भेद जो पति के उपपति बैसक बीच हँ पुधि बल सो ठहराहि ॥ ५३२॥ | उपपति का उदाहरण देखन के कोइ । | होइ || ५३३ ॥ चाह | सुख बाधन के मिलन को केहि विधि बरने चोरी को गुरु विदित यह निपट स्वाद को बंसी ढेरो श्राइ हरि तिय खिरकी खोलती गिरी कछु फिरकी सी खाइ । ५३४ । यह विचित्र aिय की कथा कहिये काहि सुनाइ । मो घट श्राणि लगाय के घट लै जल को जाइ ॥ ५३५ || श्रयी वह पानिप भरी रमनो आजु अन्हान | जिहि बूड़नि" निकसनि लखै निकलत बूड़त प्रान || ५३६ || ५३१ – १. मे ( १ ) ५३२–१···१. २, ३. प्रतियों में यह पक्ति नहीं है । - ५३३ - १. बानी ( ३ ), २. को ( १ ) । ५३४ - १. देखनि ( १ ), २. बोलतहि (३) । ५३५ -- १. चरित्र ( ३ ) | ५३६ - १. बूड़ति (२, ३) २. निकसति ( २, ३ ) । ५३१ – सने = लिप्त । ५३३ – वा = उस | गुरु = गुड, मिठाई । ४३४ -- फिरकी = चकई, फिरहरी । १३१-घट = हृदय । घट = घड़ा | ५३६ प्रदान = स्नान करने । बूड़नि निकमनि=दुबकी लगाना और पानी के - बाहर निकलना । ।
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