सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/२५२

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

१०७ अनुरक्त-लक्षण रसप्रबोध होइ जो मन बच कर्म' सो गनिका ही सो लीन । ताही सो अनुरक्त कहि भाषत है परबीन ||५४८ || उदाहरण या मन मैं अब कौन बिधि दूजी श्रानि समाइ | रह्यौ सदा बिलासिनि छाइ || ५४६ ॥ बार बिलालनि के दुजौ बेसिक' मत्त है मत-वर्णन यह बरतत बुधिवंत । खोइ तीनि बिधि काम मत सुरा मत्त धन मन्त ॥ ५५० | काममत्त - लक्षण फिरत रहत निन काम बस' कहूँ न नैकु श्रघात । दिन निज घर निसि पर घरहिं बारि नारि घरि प्रात || ५५१ | सुरामत्त-लक्षण चंपक बरनि सुबास तनि निज धन कौ न बारबधुन के नित फिरे मदै पियन की रूप सुहाइ । । चाह || ५५२ || धन मत्त उदाहरण श्रागरी नगर नागरी नागरी ल्याइ । बनाइ ||५५३ || गुनन मैं बस के बल इन छुद्र यह बस कर लाइ' ५४८ - १. करम ( २, ३ ) । ५४६ - १. रहौ ( १ ) । ५५० - १. बैमक ( १ ), २. सुधितत्त (२, ३)। ५५१ – १. बसि ( २, ३ ), २. नैन ( २, ३ ) । ५५२ – १. बरन ( २, ३ ), मद पीवन (२, ३ ) । 3) २. तन ( १ ), ३. की ( २, ३ ), ४.४, ५५३ - १. करि लई ( २, ३ ) । ५४८ - मन बच कर्म = मन, बचन और कर्म । गनिका = वेश्या, धन के लोभ से नायक से प्रेम करनेवाली । १४६ – यानि = थाकर । - = तन, शरीर । ५५२ - तनि = तन, ५५३ – ग्रागरी = श्राकर, खान, खजाना ।— नगर नागरी = वेरषा ।