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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/२५९

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रसप्रबोध ११४ गने सकल ये भेद जब दिव्यादिक मैं जात । तब चौबिस अरु तीनि सै सब नायक ठहरात" || ५६१ ॥ नाहि । जैसी बरनी नायका तैसै जे बरनन में उचित हैं तेई नायक तेई बरने जाहिँ ॥५६२ ॥ ५६१ - १.१. नायक है श्रवदात (१) ।