रसप्रबोध १४६ कांतिहि को बिस्तार खों दीपति' चित मैं लाउ । अतुल रूप की मधुरता सो सो माधुर जग नाउ ||७६६ || सोभा - उदाहरण लहत अपार । नख लिख ते अवतार ॥७६७॥ जिस देखत तुव श्रंग हग तित सुख मानो लीन्हौ' रूप ही एक सखी कर लै छरी हँसत' चकोर एक और की भीर कौं भारत चौंर काति- उदाहरण । न छाइ । डुलाइरे ॥७६८ ॥ बाल । श्रास ॥७६६ ॥ मुकुर बिमलता लहि गहे कमल मधुरता तौ तुव तन के मिलन की सुबरन राखै परी लाल आइ यह छाँह | बसी कत भरमत मन मांहि ॥ ७७० ॥ श्रमल हिये घून के जानि श्रपनी उर चंद' छानि बिधि मुख तापरि ओम धरै दीपति - उदाहरण रचे तन चपला सो ठानि । खरी तौ तूं पूजै श्रानि ॥ ७७१ ॥ ७६६–दीपत ( २, ३ ), २. माधुर्जंग ( १ ) । ७६७ – १. लीनौ (२, ३ ) । । ७६८ - १. हरत ( २, ३ ), २. डराइ ( २, ३ ) । ७७१ – १. चद्र ( १ ), ३. तुव ( २, ३ )। ७६७ —— नख - सिख = सम्पूर्ण शरीर, ऍड़ी से चोटी तक । - ७६८ -- चौंर = चँवर । ७६६ – मुकुर = दर्पण | ७७० -- अमल = निर्मल । ७७१ छानि : = ॥ = छान कर । ठानि अनुष्ठान की पूर्ति के लिए दृढ़ निश्चय करके । श्रप = श्रभा, कांति, शोभा । खरी = श्रत्यन्त बढ़िया । पूजै = समानता करे ।
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