रसप्रबोध प्रगल्भता, धीरता, विनय का - उदाहरण १४८ प्रगलभता जोबन पातिव्रत' श्ररु प्रेम गरब चलै हँसे R निरसंक । दृढ़र सो धीरत को श्रंक ||७७६ ॥ विनय' नवनि' जो सीलजुत रिस मैं रस अधिकाइ | अब बरनत हौं तिहुँन के उदाहरन को ल्याइ ||७८०|| प्रगल्भता - उदाहरण केसर श्राड़ लिलार दै बिना श्राड़ चलि श्राह । ठाड़ टोन सो मारि यह चाउ' भरी मुसुकाइ ||७८१ ॥ जाल सो मुख तें घूँघट टारि । निकसि तियनि के श्ररी हरी मति इनि इनि हरी फूल हरी फूल छरी सों छरी सों मारि ॥७८२ ॥ धीरता - उदाहरण किते सप्तरिषि लौं तऊ न ध्रुव लौं फिरत चहुँदिसि घरि घरि प्रेम | तजति यह थिरताई कौ नेम ||७८३ ॥ हनि हनि भारत मदन सर बैर तियन सो ठानि । " तऊ सुभट लौ मन डरहिं पकरि खेत कुलकानि ||७८४ ॥ ७७६ -- १. पतिव्रता (२, ३ ), २. ढिग ( १ ) । ७८० – १. जिन्है, ( १ ) २. नौनि ( १ ) | ७८१-१. चाड (२, ३ ) । ७८२ - १. की ( १ )। ७८३ - १. ध्रुव लो ( १ ), २. तजत ( १ ) । ७८४- १. १ उर डरत पकर ( १ ) ७७६ - धीरत = धीरता । ७८० - नवनि= नम्रता । रिस = क्रोध | ७८१ - श्राड = 1. स्त्रियों के मस्तक पर आड़ा टीका, २. परदा । लिलार= ललाट, माथा । टोन = टोना । ७८२ - हरी = हरण किया, हरे रंग की । ७८३ – सप्तरिषि = सप्तर्षि, उत्तर दिशा के सात तारे जो ध्रुवतारे की परिक्रमा करते हैं । ध्रुव = ध्रुवतारा । 1 ७८४ – हनि हनि = पूरी शक्ति से बैर = शत्रुता । सुभट = योद्धा । खेत = । रणक्षेत्र |
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