( १० ) गिता, गभीरता, विशदता और व्यापकता श्रादि मुगल स्थापत्यकला के मूलाधार थे । गरिमा के साथ सहज सतुलित गंभीर प्रभाव तत्कालीन स्थापत्य कला की चेतना के प्राण थे। किंतु अकबर के शासन के सुदृढ़ होते ही श्रलंकरण श्रौर पच्चीकारी ने इस क्षेत्र में अपना स्थान ग्रहण किया और दिनोत्तर इनका प्रभाव बढ़ता गया । इसका सर्वोत्तम दृष्टांत ताजमहल है । शाहजहाँ तक इस स्थापत्य कला में मौलिकता थी किंतु प्रभावाकर्षण और अलंकरण की प्रवृत्ति जहाँगीर के समय से ही उपयोगिता, गंभीरता और सहज भव्यता की अपेक्षा प्रदर्शन, कोमलता और लालित्य की ओर बढ़ती गई । तत्कालीन भवनों में पच्चीकारी तथा विलासपूर्ण भित्तिचित्रों, यहाँ तक कि रत्नालंकरण की वृत्ति का भी दर्शन होता है। साथ ही इसके विकास के लिये अतुल सापत्तिक साधन की भी अपेक्षा होती है । ताजमहल के निर्माण तक इस साधन का प्रयोग हुना किंतु शाहजहाँ के ही जीवन के श्रुतिम दिनों मे ही मुगल साम्राज्य की आर्थिक स्थिति ऐसे निर्माणों के लिये सक्षम न रह गई थी। मुगलों की देखादेखी अन्यत्र भी भव्य प्रासादों का निर्माण हुआ किंतु औरंगजेब के बाद इस क्षेत्र मे कोई विशेष उल्लेखनीय कृति संमुख नहीं श्राई । इस प्रकार स्थापत्यकला में भी अनुकरण, कोमलता, विलासिता, आलं- कारिता तथा प्रदर्शन का श्राधिक्य इतना हुआ कि उसे उदात्त नहीं माना जा सकता तथा ये निर्माण लोकपरक न होकर व्यक्तिपरक हो उठे; भले ही कुछ मंदिर और मस्जिद इसके अपवाद माने जायँ । साहित्य का क्षेत्र भी इसी भाँति का ही रहा । हिंदी साहित्य का निर्माण अवधी और ब्रम में मुगल शासन की स्थापना के तत्काल उपरांत हो रहा था और दिनोत्तर उसमे भी उन्ही प्रवृत्तियों का उन्नयन, पल्लवन और विकास हुआ जो क्ला जो क्ला के श्रन्य क्षेत्रों में भी परिव्याप्त थीं । श्र ेष्ठ साहित्यनिर्माण के लिये उन्मुक्त वातावरण साहित्यकार की श्राधार- भूत श्रावश्यकता है । श्राश्रय का संकोच इस निर्माणप्रक्रिया में मौलिक रचना के लिये अवरोध उत्पन्न करता है । उस युग में साहित्यकार के लिये उपलब्ध साधन नाना प्रकार के थे। मुगलो की सत्ता की स्थापना के श्रादिकाल में स्रष्टा सामान्यतः उन्मुक्त था और उसका श्राश्रयदाता भी उदारमना शासक था या वह लोकाश्रित था । लोकाश्रय के अतिरिक्त संप्रदाय का श्राश्रय भी सुलभ था । १ शासनकाल सन् १६२७ - १६५८ ई० ।
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