१५६ 'रसलीन' त्रास - लक्षण त्रास भाव प्रगटै सदा घोर दरस सुधि' पाइ । स्तंभ कंप धकधकहु ते तन मैं होत जनाई ॥ ८४२ || उदाहरण हंसति" हँसति" तिथ कोप कै पिय सों चली रिसाइ । निरखि दामिनी तरप कौ डरपि गई लपटाइ ॥ ८४३ ॥ देख देख के पुरुष सब चलत रावरी बात । यौं काँपत ज्यों बात ते रूख रूख के आवेग - लक्षण अरि दरसन उतपात सो श्रावेग लच्छन' पात ॥ ८४४॥ लहि मित्र सत्रु जँह होइ । तपन विभ्रम भ्रम ते जोइ ||८४५ || उदाहरण परी हुती पिय पास तहिं गई सालु वँहु आइ । सटपटाइ सकुचाइ तिय भाजी भवन दुराइ ॥ ८४६ ॥ ८४२ – १ धुनि ( १ ) । ८४३—१. १. हॅसत हँसत ( १ ), २. किनारी (२, ३ ) । ८४४ – १. काँपति ( २, ३ ) । ८४५ - १. खेलन ( २, ३ ), २. होइ ( २, ३ ) । ८८४६ - १. तह ( १ ), २. कह ( २, ३ ), ३. डराइ ( २, ३ ) | ८४२-त्रास= डर, भय, कष्ट । स्तंभ = जडता, एक प्रकार का संचारी भाव । कंप= कँपकँपी, सात्विक भावों में से एक । धकधकहु = धकधकी, भय से जी का धड़कना । ८४३-तरप-तड़पन | ८४४ – बात=भा । रूख रुखवृत्त वृक्ष | ८४१ – उवपात = हलचल । "आवेग = तैश, रस के तैंतीस संचारी भावों में से एक । ८४६ - भाजी = भागी ।
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