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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/३०५

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रसप्रबोध १६० सुनि तुव दल श्ररि तियन की ऐसी गति दरसात । भजति गिरति 'गिरि गिरि भजति 'भजि भजि गिरि गिरि जात || ८४७|| जौं काहू गर्व-लक्षण अधिकार ते अहंकार मन होइ । 3 पर निदरे तै लखि परे गरबर रहत है सोइ ॥ ८४८॥ २ उदाहरण पीतम' पठई बेंदुली सो लिलार सौतिन में बैठी तिया कछु ऐंठी सी आँसू-लक्षण परगुन दरब बिलोकि कै होत सु दोष कथन उप बचन ते प्रगट झमकाइ ३ । जाइ ॥ ६४६॥ श्रसुँवा ' श्रानि । लीजिए जानि ॥ ८५०॥ ॥ कमला हरि के उर 9 उदाहरण बसे लह्यौं' उरबली नाउ । यहि गुन राधे उर बसी बैठी बाँधे पाँउ || ८५९॥ श्रमर्ष - लक्षण उपमानादिक ते कछू कोप श्रवै' सु श्रमर्ष । दहियत बचन कठोर तहँ ताप बढ़े २ घटि हर्ष ॥ ८५२ ॥ ८४७ - १. भजत ( १ ), २. गिरत ( १ ), ३. फिरि ( २, ३ ) । ८४८ - १. निदर ( १ ), २. गर्व ( १ ), ३. कहावै ( २, ३ ) । ८४६ - १. प्रीतम (२, ३), २. बिंदुली (२, ३ ), ३. चमकाइ ( २, ३ ) । ८५० - १. श्रखैया ( १ ), २. जोग ( २, ३ ) । ८५१ - १. लहौ ( १ ) । ८५२ - १. श्राव (२, ३) २२. बढ़ें ताप (२, ३) ३. घट ( २, ३ ) | ८४७ - भजति = भागती है । ८४५ - निदरे = निंदा करे | ८४६–झमकाइ=आभूषण धारण कर आकृष्ट करने के लिए उससे श्रावाज करना । ८५० - दोस कथन- ऐब का कहना । उपबचन = निंदा । ८५१ - बैठी बाँधे पाउ = दृढ़ता पूर्वक अवस्थित होना । ८११ - अमर्ष = क्रोध ।