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पृष्ठ:रसलीन ग्रंथावली.djvu/३०६

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१६१ 'रसलीन' कहा कहौं मों प्रभु ना तर रे राकस जो दासी के के बस उदाहरण भए जग कहाइ बृजराज | तिनकी ये बतियाँ करत तुम्है न श्रावत लाज ॥ ८५३ ॥ मोहि । नहीं दीन्हौं' सासन कछू हौं दिखावती तोंहि ॥ ८५४ ॥ सोइ तरजन ताड़न होइ ॥ ८५५ ॥ उदाहरण उग्रता - लक्षण हियो जो निरदयता सोइ । अवराधादिक" ते " हियो जो उग्रता जानिये खील फूल जेहि लाल को सौतिन करे तेहि राखौंगी श्राजु हौं पायल माहिं उत्सुकता -लक्षण | बनाइ । लगाइ ||८५६ ॥ सहि न सकै जो कालगति उतसुकता तिहि जान । उपजै औधि विभाव सो बिकलाई ते उदाहरण पतिया पठवन कहि गए सो नहि पठई ताही की अवसेरि' मैं बिकन्त भई है ८५४ - १. दीनों ( २, ३ ) । मान ||८६५७ ॥ लाल । बाल ||८५८८ ॥ ८५५—१···१. अपराधिक ते जो ( २, ३ ), २. होइ ( २, ३ ) । ८५७ - १. ते ( १ )। ८५८ - १. श्रवसेर ( २, ३ ) । ८५३ - दासी = सेविका ( कुब्जा ) । बतियाँ करत = बात करते हैं । ८१४ – सासन=शासन, अधिकार देना, नियंत्रण | राक्स= राक्षस | ८१५५ - श्रवराधादिक = रोकने या बाधा आदि डालने की क्रियाएँ । उग्रता = कठोरता । तरजन =भर्त्सना, डाँटना । ताड़न= मारना । ८५७———कालगति=समय का फेर । औधि = अवधि, निश्चित समय | बिकलाई ... व्याकुलता । ८१८ – पतिया = पत्र, चिट्ठी । पठवन = भेजने की क्रिया । श्रवसेरि = बिलंब होना, प्रतीक्षा होना । ११